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ये देसी खाद है सबका बाप! एक साल में तीन खेती से मुनाफा कमा रहा ये समझदार किसान

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शिवपुरी की नरवर तहसील के ग्राम पंचायत समोहा के प्रगतिशील किसान बहादुर सिंह ने प्राकृतिक खेती का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया है. उन्होंने एक ही साल में तीन फसलें गेहूं, मूंग और धान उगाकर यह साबित कर दिया है कि बिना रासायनिक खाद के भी भरपूर और गुणवत्तापूर्ण उपज प्राप्त की जा सकती है.

बहादुर सिंह बताते हैं कि कुछ वर्षों पहले तक वे पारंपरिक तरीके से खेती करते थे और डीएपी, यूरिया जैसी रासायनिक खादों का उपयोग करते थे. इससे फसलें तो मिलती थीं, लेकिन मिट्टी की उपजाऊ शक्ति लगातार घट रही थी. तब उन्होंने खेती का तरीका बदलने का निश्चय किया और प्राकृतिक खेती की दिशा में कदम बढ़ाया.

उन्होंने स्वयं जैविक खाद तैयार की जिसे उन्होंने ‘जीवामृत’ नाम दिया. यह खाद उन्होंने गोमूत्र, गाय का गोबर, बरगद के पेड़ की मिट्टी और बेसन मिलाकर तैयार की. इस खाद के उपयोग से मिट्टी की नमी और उर्वरकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ और फसलें पहले से अधिक स्वस्थ दिखने लगीं.

बहादुर सिंह बताते हैं कि उनकी पहली फसल गेहूं की थी, जिसका औसत उत्पादन लगभग 9 क्विंटल प्रति बीघा रहा. इसके बाद उन्होंने मूंग की खेती की, जिससे 2 क्विंटल प्रति बीघा की उपज मिली. अब उनकी धान की फसल खेत में खड़ी है, और वे उम्मीद जता रहे हैं कि यह रासायनिक खाद से की गई फसल की तुलना में लगभग 19–20 प्रतिशत अधिक उत्पादन देगी.

उन्होंने बताया कि जैविक खेती से फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और उत्पादन भी स्थिर बना रहता है. साथ ही, रासायनिक खाद के दुष्प्रभावों से भूमि और मानव स्वास्थ्य दोनों को राहत मिलती है. उनके अनुसार रासायनिक खादें मिट्टी को जहर बना रही हैं, जबकि प्राकृतिक खाद से भूमि की उर्वरता और फसलों की पौष्टिकता दोनों बढ़ती हैं.

बहादुर सिंह का मानना है कि किसान भाइयों को कम से कम अपने घरेलू उपयोग की फसलों में रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं करना चाहिए. उनका कहना है कि अगर किसान प्राकृतिक खेती की ओर लौट आएं, तो हमारे शरीर और पर्यावरण दोनों का स्वास्थ्य सुधरेगा.

आज बहादुर सिंह का यह प्रयास उनके क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत बन गया है. आसपास के कई किसान अब उनकी तरह प्राकृतिक खेती अपनाने की तैयारी कर रहे हैं. यह उदाहरण दर्शाता है कि अगर इच्छा हो तो सीमित संसाधनों में भी किसान खेती की नई दिशा तय कर सकता है.

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