बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के रामगढ़वा ब्लॉक में स्थित सुखी-सेमरागाँव, कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और विकास की एक शानदार मिसाल बनकर उभरा है। यह गाँव कभी कठिन कृषि परिस्थितियों से जूझ रहा था, लेकिन अब यहाँ धान की बंपर खेती और कृषि-आधारित विकास देखने को मिल रहा है।
पूर्वी चंपारण: बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के रामगढ़वा प्रखंड अंतर्गत स्थित सुखी-सेमरा गांव आज खुशहाली की मिसाल बन चुका है, लेकिन करीब 20 वर्ष पहले इसकी तस्वीर बेहद भयावह थी. ग्रामीणों के अनुसार, एक समय ऐसा था जब यहां मुट्ठी भर चावल उपजाना भी मुश्किल था. लोगों को भरपेट भोजन नसीब नहीं होता था. कई परिवार एक वक्त खाना खाते और दूसरे वक्त भूखे ही सो जाते थे. किसानों की हालत दयनीय थी वे फसल बोते, लेकिन हर बार बर्बादी हाथ लगती.

किसानों ने धान की खेती लगभग छोड़ दी थी
गांव के पास बहने वाली सिकरहना नदी किसानों के लिए अभिशाप बन गई थी. धान की फसल लगते ही नदी का पानी खेतों में घुस जाता और पूरी फसल चौपट हो जाती. लगातार नुकसान से परेशान किसानों ने धान की खेती लगभग छोड़ दी थी.
किसानों की मेहनत रंग लाई
हालात तब बदले जब ग्रामीणों की समस्याओं को सुनते हुए तत्कालीन विधायक सगीर अहमद ने सिकरहना नदी पर बांध निर्माण की पहल कराई. बांध बनने के बाद नदी का पानी खेतों में जाना बंद हो गया. इसके साथ ही किसानों की मेहनत रंग लाई और गांव की तस्वीर बदलने लगी.
बासमती चावल पूरे जिले में प्रसिद्ध
आज सुखी-सेमरा में बड़े पैमाने पर धान की खेती होती है. यहां की बासमती चावल अपनी अनोखी और मनमोहक सुगंध के लिए पूरे जिले में प्रसिद्ध है. लंबी किस्म की बासमती के पौधे 5 से 7 फीट तक ऊंचे होते हैं. उपजाऊ मिट्टी के कारण गांव हरियाली से आच्छादित रहता है. धान के अलावा गेहूं और मसूर की भी व्यापक खेती की जा रही है.
गांव अब समृद्धि की पहचान बना
कभी बदहाली और पलायन के लिए जाना जाने वाला यह सुदूर देहाती गांव अब समृद्धि की पहचान बन चुका है. सिकरहना नदी के प्रकोप से मुक्ति के बाद किसानों की आय बढ़ी है और गांव सचमुच ‘सुखी-सेमरा’ बन गया है.