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भीलवाड़ा में अफीम खेती आस्था और मेहनत का संगम

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भीलवाड़ा में अफीम की खेती धार्मिक आस्था से जुड़ी है, नाणा माता जी की पूजा के बाद चीरा लगाया जाता है. कोटड़ी, जहाजपुर, बिजौलिया, मांडलगढ़, बेगूं, रावतभाटा में 6758 किसान खेती करते हैं. अफीम की खेती में चीरा लगाने से पहले खेत की मेड़ पर नाणा माता जी की पूजा की जाती है. शुभ मुहूर्त में पांच या सात डोडों की विशेष पूजा होती है. इसके बाद ही पके हुए डोडों पर चीरा लगाया जाता है.

भीलवाड़ा जिले में काला सोना कही जाने वाली अफीम की खेती इन दिनों अपने सबसे अहम चरण में पहुंच चुकी है. यह खेती यहां केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़ा कार्य मानी जाती है. खेतों में अफीम के पौधों पर डोडा पकने लगा है और इसके साथ ही विधि विधान से पूजा अर्चना का दौर भी शुरू हो गया है. किसान खेतों में नाणा माता जी की स्थापना कर पूरी श्रद्धा के साथ इस प्रक्रिया की शुरुआत करते हैं.

अफीम की खेती में चीरा लगाने से पहले खेत की मेड़ पर नाणा माता जी की पूजा की जाती है. शुभ मुहूर्त में पांच या सात डोडों की विशेष पूजा होती है. इसके बाद ही पके हुए डोडों पर चीरा लगाया जाता है. किसानों का मानना है कि बिना पूजा के की गई चिराई से फसल पर विपरीत असर पड़ सकता है. आने वाले कुछ दिनों में यह प्रक्रिया नियमित रूप से चलती रहेगी.

सूर्योदय से पहले होता है अफीम के दूध का संग्रह
किसान रूप लाल ने बताया कि अफीम उत्पादक किसानों ने डोडों में चीरा लगाना शुरू कर दिया है. चीरा लगाने के बाद डोडों से निकलने वाले दूध को एकत्र किया जाता है. इसके लिए किसान सूर्योदय से पहले ही परिवार के साथ नंगे पांव खेतों में पहुंचते हैं. विशेष प्रकार के औजार से डोडों की चिराई की जाती है और छरपले में अफीम का दूध इकट्ठा किया जाता है. इस दौरान किसान अपनी फसल की रखवाली भी करते हैं, ताकि पशु, पक्षी या तस्कर किसी तरह का नुकसान न पहुंचा सकें.

फसल और परंपरा का गहरा संबंध
अफीम की खेती में धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व है. खेतों की मेड़ पर सात या नौ नाणा माता जी की स्थापना की जाती है. किसान मानते हैं कि माता जी की कृपा से फसल अच्छी होती है और मेहनत सफल होती है. यही कारण है कि हर चरण में पूजा अर्चना को अनिवार्य माना जाता है. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जाती है.

भीलवाड़ा डिवीजन में इन तहसीलों में होती है अफीम की खेती
भीलवाड़ा नारकोटिक्स विभाग के अंतर्गत भीलवाड़ा जिले की चार और चित्तौड़गढ़ जिले की दो तहसीलों में अफीम की खेती की जाती है. इनमें भीलवाड़ा जिले की कोटड़ी, जहाजपुर, बिजौलिया और मांडलगढ़ तहसील शामिल हैं. वहीं चित्तौड़गढ़ जिले की बेगूं और रावतभाटा तहसील भी इस सूची में आती हैं. इन छह तहसीलों के कुल 6758 किसानों को भीलवाड़ा नारकोटिक्स विभाग की ओर से अफीम बुवाई के पट्टे जारी किए गए हैं.

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