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जानिए,पिंक ताइवान अमरूद की खेती में क्या है मुनाफ़े और लागत का गणित

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किसान खेती किसानी में लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं। किसान परंपरागत खेती के साथ-साथ फलों और पेड़ों की खेती भी कर रहे हैं। आजकल देश के किसानों के बीच अमरूद की खेती में ताइवान किस्म के यानि कि पिंक अमरूद की मांग है। इसी कड़ी में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले के मर्मी गांव के रहने वाले आशीष विजयवर्गीय अमरुद की नर्सरी चलाते हैं।चित्तौड़गढ़ के आशीष ने बताया कि उन्होंने 2014 से नर्सरी की शुरुआत की थी। इस नर्सरी में अमरूद की उन्नत किस्मों पर काम करते हैं। अमरुद आज वर्तमान स्थिति में सबसे ज़्यादा बिकने वाला फल है। अमरूद की खेती किसी भी क्षेत्र में की जा सकती है। जानिए अमरूद की खेती से जुड़ी अहम बातों के बारे में।

वो अपनी नर्सरी से देश के कई हिस्सों में किसानों को पिंक अमरूद की किस्म पहुंचा रहे हैं। आइए जानते हैं पिंक अमरूद की खेती से जुड़ी अहम बातों के बारे में।

कैसे हुई अमरूद नर्सरी की शुरुआत?

राजस्थान चित्तौड़गढ़ के आशीष ने बताया कि उन्होंने 2014 से नर्सरी की शुरुआत की थी। इस नर्सरी में अमरूद की उन्नत किस्मों पर काम करते हैं। अमरुद आज वर्तमान स्थिति में सबसे ज़्यादा बिकने वाला फल है। इसकी खेती किसी भी क्षेत्र में की जा सकती है। उनकी इस नर्सरी से भारत के अलग-अलग हिस्से से करीब 3500 किसान जुड़े हुए हैं। आशीष ने अपनी नर्सरी में बेर, अमरुद, आम, सीताफल, ड्रैगन फ्रूट, चीकू और मौसमी संतरा आदि फलदार पौधे लगाए हुए हैं।

नर्सरी में कौन-कौन सी अमरूद की उन्नत किस्में?

आशीष ने बताया कि अमरूद की कई उन्नत किस्में बाज़ार में मिल जाती हैं। उन्होंने अपनी नर्सरी में एल 49, बर्फ का खान इन किस्मों के साथ नर्सरी की शुरुआत की। अभी ताइवान पिंक और रेड डायमंड उनकी नर्सरी में पौधे मिल जाएंगे। ताइवान पिंक बहुत जल्दी फल देने वाला फल होता है। इस किस्म में किसानों को साल भर में फल मिल जाता है। इससे किसान को अच्छी आमदनी होती है। अभी बाज़ार में  सबसे ज्यादा रेड डायमंड की है। अमरूद की खेती हर मिट्टी में की जा सकती है।

इवान पिंक उन्नत किस्म की पहचान कैसे करें?

अमरुद की ताइवान पिंक की किस्म का पौधा एक से डेढ़ फुट का आता है। इसमें किसानों को क्लोन प्रजाति वाला पौधा लेना चाहिए। ये पौधा कम फैलाव में ज्यादा उत्पादन देता है। अमरूद की प्रजाति पत्तों को देख कर पहचानी जा सकती है। ताइवान किस्म का पौधे में फल लगा आता है,लेकिन पौधे का पूरा विकास होने के लिए 1 साल तक लग जाता है।

अमरूद के पौधे में लगने वाले रोग

आशीष ने बताया कि किसान अगर कीट और रोगों का नियंत्रण नहीं कर पाता है। इससे किसानों को  नुकसान उठाना पड़ता है। अमरूद की वैरायटी में तीन से चार तरह के रोग आते हैं। उन रोगों का समाधान करना जरूरी होता है। पहले रोग की बात की जाए तो निमेटोड है । इस रोग का लक्षण है कि जड़ में गांठ बन जाती है। इससे पौधे की ग्रोथ रुक जाती है। इसके इलाज के लिए वेलम प्राइम, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड आता है। इन से किसान को निमेटोड का इलाज साल में एक बार करना चाहिए। अमरूद में दूसरी बीमारी मिलीबग आती है। इसके लिए किसान देसी तरीके से इलाज कर सकते हैं। किसान साबुन या डिटर्जेंट पाउडर के घोल का स्प्रे करना चाहिए। तीसरी बीमारी अमरूद में फल मक्खी लग जाती है। जब पेड़ में फल लगना चालू हो जाता है तब ये रोग लगता है इसके लिए किसान को कीटनाशक साइफर मैथिन, इमेडा का इस्तेमाल करना चाहिए।

अमरूद के पौधे में लगने वाले रोगों के लक्षण

निमेटोड बीमारी  में पत्ता किनारे से काला होने लगता है। इसके साथ ही पौधे की ग्रोथ रुक जाती है। इसे पता करने के लिए किसान को पौधे की जड़ खोद के चेक करना चाहिए । मिलीबग की पहचान करने पौधे की पत्तियों और तने पर सफेद रंग का मोम जैसा चिपक जाता है। फल मक्खी बिल्कुल मच्छर के समान होती है। वो फल की खुशबू से आती है। ताइवान पिंक किस्म में कोई विशेष बीमारी नहीं होती है।

पौधे को नर्सरी से लेते वक्त किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

जब किसान अमरूद का पौधा नर्सरी से खरीद रहे हों, उस दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे कि पत्तों में कोई रोग तो नहीं लग रहा है, पत्ते पीले तो नहीं पड़ रहे हैं। अगर पौधे के नीचे के पत्तों में पीलापन है तो नाइट्रोजन की कमी है। अगर ऐसा ऊपर है तो पत्तों में माइक्रो न्यूट्रॉन की कमी है। किसान को पौधे लेते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। अमरुद के पौधे को लू और शीतलहर से बचाव करना चाहिए। शीतलहर से बचने के लिए सल्फर का इस्तेमाल करें या हल्की सिंचाई करें।

अमरूद के पौधे को खेत में कैसे रोपे?

अमरूद के पौधे को लगाने के लिए किसानों को सबसे पहले अपना नेट हाउस तैयार करना है। नर्सरी से पौधा ले जाने के बाद एक से दो दिन तक अपने शेड हाउस में पौधे रखना चाहिए। जब तक खेत में प्रॉपर रोपाई नहीं हो जाती। पौधा लगाने से पहले डेढ़ बाई डेढ़ का गड्ढा खोदना है। कम से कम 6 बाई 6 की दूरी रखनी चाहिए। रोपाई करते समय एक पौधे में पांच से दस किलो देसी खाद डालनी चाहिए। अगर दीमक की समस्या है तो रोपाई के समय रीजेंट और फॉरेंट मिला सकते हैं। सिंगल सुपर फास्फेट और डीएपी का घोल बनाकर 200 से 300 ग्राम एक गड्ढे में डालना चाहिए।

अमरूद की खेती में लागत और मुनाफ़ा कितना होता है?

किसान एक एकड़ में 650 से 750 पौधा लगा लेगा। इसके साथ ही किसान कितनी दूरी पर लगाना चाह रहा है उसपर निर्भर करता है। अमरूद का पौधा 30 से 40 रुपए पर पौधे के हिसाब से पड़ता है। फिर बाज़ार उतार-चढ़ाव पर भी निर्भर करता है। इसके बाद 10 रुपए पौधा लगाने में लागत आती है। इसके साथ ही साल 10 रुपए प्रेसटिसाइस का खर्च आ जाता है।

मुनाफ़े की बात की जाए तो एक पौधा 50 किलो से एक क्विंटल तक फल देता है। बाज़ार में 35 रुपए प्रति किलोग्राम से 100 रुपए प्रति किलोग्राम तक अमरूद बिकता है। रेड डायमंड 80 रुपए किलोग्राम बिकता है। ताइवान पिंक 30 रुपए से 60 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। ये होलसेल के भाव हैं।

अमरूद की खेती में कब सिंचाई करनी चाहिए?

अमरूद के खेत में सिंचाई जलवायु, मिट्टी और पौधे की हाइट पर ध्यान रख कर सिंचाई करनी चाहिए। अगर किसान ड्रिप इरिगेशन कर रहा है तो दो से तीन में एक बार कर देनी चाहिए। अगर किसान फ्लड इरिगेशन कर रहा है तो हफ्ते में एक बार सिंचाई करनी चाहिए। पौधों की सिंचाई मौसम पर भी निर्भर करती है।

अमरूद का बाज़ार किसान कैसे बनाए?

आशीष कहते हैं कि हर ज़िला स्तर पर फल मंडी होती है। वहां पर किसान अपने उत्पादन को बेच सकता है। दिल्ली की आजादपुर मंडी में अमरूद का सबसे ज्यादा रेट मिलता है।

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