भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ शहरों के सभागारों और संसद जैसे मंचों पर नहीं लड़ी गई, बल्कि खेत-खलिहानों की मिट्टी में भी इसकी गूंज थी। जब अंग्रेजी हुकूमत और सामंतशाही के दोहरे जुल्म ने किसानों की रग-रग से पसीना निचोड़ लिया, तब हल पकड़े हाथ विद्रोह की मशाल थामने लगे। उत्तर प्रदेश के अवध से लेकर राजस्थान के बिजोलिया तक किसानों ने अपने हक और सम्मान के लिए ऐसी जंग छेड़ी, जिसने न केवल उनके जीवन को बदल दिया, बल्कि पूरे राष्ट्र को स्वतंत्रता के रास्ते पर आगे बढ़ाया।इतिहासकार बताते हैं कि अंग्रेजी शासन में किसानों पर कभी 143 तरह के कर (TAX) थोप दिए गए थे। इन करों को वसूलने के लिए नियुक्त जमींदार और तालुकदार घोषित कर से भी अधिक वसूली करते थे।
अवध किसान आंदोलन : 143 तरह के करों का कहर
इतिहासकार बताते हैं कि अंग्रेजी शासन में किसानों पर कभी 143 तरह के कर (TAX) थोप दिए गए थे। इन करों को वसूलने के लिए नियुक्त जमींदार और तालुकदार घोषित कर से भी अधिक वसूली करते थे। किसानों के घर बच्चा जन्म लेने, शादी-विवाह या मृत्यु जैसी घटनाओं पर भी उन्हें ‘नजराना’ देना पड़ता था। इस अन्याय ने किसानों की कमर तोड़ दी थी।
किसान सभा का गठन
किसानों को इस दयनीय स्थिति से निकालने के लिए स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं ने गांव-गांव में आंदोलन शुरू किया। पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी ने फरवरी 1918 में किसान सभा की स्थापना की। जून 1919 तक अवध प्रांत में इसकी 450 से अधिक शाखाएं बन चुकी थीं।
किसानों से ली जाती थी शपथ
दिसंबर 1920 में किसान सभा में बाबा रामचंद्र जुड़े। महाराष्ट्र में जन्मे रामचंद्र ने अवध को अपनी कर्मभूमि बना लिया। वे रात में रामायण पाठ और सत्यनारायण कथा के जरिए किसानों को एकजुट करते और उनसे शपथ लेते कि वे तालुकदारों के खेतों में मजदूरी नहीं करेंगे।
मतभेद और अलग आंदोलन
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजी शासन ने नए कर लगाए। किसान सभा में मतभेद हुआ, कुछ नेता अंग्रेजों से समझौते की राह चाहते थे, जबकि बाबा रामचंद्र का मानना था कि यही समय है उन्हें देश से निकालने का। आखिरकार उन्होंने अवध किसान आंदोलन की अलग बागडोर संभाली। यह आंदोलन प्रतापगढ़, बरेली, फैजाबाद में फैला। हालांकि कुछ किसानों की लूटपाट की घटनाओं ने इसे हिंसक छवि दी, जिसका फायदा अंग्रेजों ने उठाया और दमन तेज कर दिया।
फुर्सतगंज गोलीकांड
6 जनवरी 1921 को फुर्सत गंज बाजार में गोलीकांड हुआ, जिसमें कई किसान मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। इसके बाद सरकार ने कुछ कर सुधार किए, लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन धीमा पड़ गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में बाबा रामचंद्र की सराहना भी की और बाद में आलोचना भी, लेकिन बाबा ने साफ कहा, “मैं किसी से कुछ नहीं मांगता, मैं किसानों के लिए जीता हूं और सब कुछ उन्हीं के लिए करता हूं।”
बिजोलिया किसान आंदोलन : सामंतशाही के खिलाफ लंबा संघर्ष
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बिजोलिया गांव में 1915 में साधु सीताराम ने नए ठिकानेदार पृथ्वी सिंह द्वारा लगाए गए ‘तलवार बधाई शुल्क’ का विरोध किया। उस समय किसानों पर 84 तरह के कर थे। विरोध के चलते साधु सीताराम को गांव से निष्कासित कर दिया गया, लेकिन यही चिंगारी आंदोलन की ज्वाला बनी। साधु सीताराम ने बुलंदशहर के विजय सिंह पथिक को बुलाया, जो माणिक्य लाल वर्मा के साथ आंदोलन में जुटे। तीनों के नेतृत्व में किसानों ने करों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
1917 से 1941 तक चला आंदोलन
यह आंदोलन 1917 से 1941 तक तीन चरणों में चला। आखिर 1941 में समझौते के तहत सभी कर माफ कर दिए गए। अंतिम चरण में माणिक्य लाल वर्मा ने कमान संभाली। आज भी बिजोलिया गांव में हर सरकारी या सामाजिक कार्यक्रम से पहले आंदोलन के नायकों की समाधियों पर माल्यार्पण होता है।
