पपीते की खेती ने बदल दी बिहार के किसान की किस्मत,4 एकड़ में 1600000 का मुनाफा…

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बिहार के सीतामढ़ी में अब ​खेती-किसानी में बदलाव की बयार बह रही है. इस आधुनिक दौर में किसान अब गेहूं-धान जैसी पारंपरिक फसलों के मोह को छोड़कर बागवानी और नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. इस बदलाव की एक शानदार मिसाल पेश कर रहे हैं प्रगतिशील किसान ब्रजकिशोर महतो. वह पपीते की खेती को अपनाकर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किए हैं,  बल्कि अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणास्रोत भी बन गए हैं.

​एक एकड़ से है 10 एकड़ का लक्ष्य

यहां के किसान ब्रजकिशोर ने पपीते की खेती के सफर की शुरुआत महज एक प्रयोग के तौर पर 1 एकड़ जमीन से की थी. जब पहली फसल से उम्मीद से कहीं अधिक मुनाफा मिला तो उनका उत्साह दोगुना हो गया. उन्होंने तुरंत अपनी खेती का दायरा बढ़ाकर 4 एकड़ कर दिया. वर्तमान में उनकी सफलता का पैमाना यह है कि वे अब अपनी खेती को 10 एकड़ तक ले जाने की बड़ी योजना पर काम कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने अपने गांव के साथ-साथ अमरहा में भी जमीन लीज पर ली है. जहां पर जल्द ही पपीते के नए बाग लहलहाएंगे.

4 एकड़ से होता है ₹16 लाख का मुनाफा

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पपीते की खेती को ‘मुनाफे का स्वर्ण अवसर’ क्यों कहा जा रहा है. इसका अंदाजा ब्रजकिशोर की कमाई से लगाया जा सकता है. किसान बताते हैं कि वह एक एकड़ में पपीते की फसल से सामान्यतः 3 से 4 लाख रुपये की सालाना कमाई कर लेते हैं. इस हिसाब से उनके 4 एकड़ के खेते से 12 से 16 लाख रुपये की आमदनी आसानी से हो जाती है. किसान ने बताया कि इस बार अत्यधिक बारिश के कारण उत्पादन पर थोड़ा असर पड़ा है, अन्यथा उनकी आमदनी का आंकड़ा आसानी से 16 लाख रुपये के पार चला जाता. यह मुनाफा किसी भी पारंपरिक फसल के मुकाबले कई गुना अधिक है.

3 माह में नर्सरी में तैयार होते हैं पौधे

वहीं, ​बेहतर उत्पादन के लिए किसान ब्रजकिशोर तकनीक और समय प्रबंधन पर विशेष ध्यान देते हैं. उनके अनुसार, पपीते की खेती की सफलता उसकी नर्सरी पर टिकी होती है. एक अच्छी नर्सरी तैयार करने में लगभग 3 से 4 महीने का समय लगता है. पौधों की रोपाई के समय वे एक विशेष सावधानी बरतते हैं. जहां पौधों को हमेशा 3 से 6 इंच की गहराई के बीच ही लगाया जाना चाहिए. सही गहराई और उचित अंतराल ही पौधों के स्वस्थ विकास और फलों के वजन को सुनिश्चित करता है. वहीं, रोपाई के बाद पौधों को समय-समय पर जरूरी पोषक तत्वों की ‘खुराक’ दी जाती है.

बाजार में रहती है इस पपीते की भारी मांग

आज के दौर में जहां मिट्टी की सेहत गिर रही है. वहीं, किसान ब्रजकिशोर ने जैविक खेती को अपना हथियार बनाया है. वह रसायनों और घातक कीटनाशकों से दूरी बनाकर चलते हैं. उनके बागों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नाममात्र का होता है. जबकि पारंपरिक गोबर की खाद पर उनका पूरा भरोसा है. उनका मानना है कि गोबर की खाद के उपयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरकता बनी रहती है. बल्कि खेती की लागत भी काफी कम हो जाती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जैविक तरीके से तैयार पपीता स्वाद में मीठा और स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक गुणकारी होता है, जिसकी बाजार में भी भारी मांग रहती है.

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