पुर। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने घूसखोरी के मामले में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आइटीएटी) में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करते हुए ज्यूडिशियल मेंबर और वकील सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। आइटीएटी में असिस्टेंट रजिस्ट्रार केसी मीना पर भी रिश्वत लेने का आरोप है, जिसकी जांच की जा रही है।सीबीआइ की जांच में सामने आया कि आरोपी अपीलों को अपीलकर्ताओं के पक्ष में निपटाने के लिए रिश्वत लेते थे। इस नेटवर्क में हवाला चैनलों के जरिए रकम का लेन-देन किया जाता था।
सीबीआइ ने जयपुर, कोटा सहित 9 ठिकानों पर छापेमारी की है। सीबीआइ ने बताया कि आरोपी राजेंद्र सिसोदिया (वकील), डॉ. एस. सीतालक्ष्मी (ज्यूडिशियल मेंबर) और मुजम्मिल (अपीलेंट) को गिरफ्तार किया गया है। तीनों आइटीएटी जयपुर में तैनात हैं। पुलिस ने तीनों को सीबीआइ की विशेष अदालत जयपुर प्रथम में पेश किया, जहां से उन्हें तीन दिन के पुलिस रिमांड पर सौंप दिया गया। इस मामले में जयपुर की टीम ने कोटा में भी एक कारोबारी समूह के तीन पार्टनर के यहां दस्तावेजों की जांच की।
पक्ष में मामला निपटाने के लिए लेते थे घूस
सीबीआइ की जांच में सामने आया कि आरोपी अपीलों को अपीलकर्ताओं के पक्ष में निपटाने के लिए रिश्वत लेते थे। इस नेटवर्क में हवाला चैनलों के जरिए रकम का लेन-देन किया जाता था। 25 नवंबर को वकील राजेंद्र सिसोदिया को 1.5 लाख रुपए की रिश्वत की रकम के साथ गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद 26 नवंबर को ज्यूडिशियल मेंबर डॉ. सीतालक्ष्मी को उनकी कार से 30 लाख रुपए बरामद होने पर हिरासत में लिया गया। इसी दिन अपीलेंट मुजम्मिल को भी गिरफ्तार किया गया।
छापेमारी में मिले 1 करोड़ 15 लाख नकद
सीबीआइ की टीमों ने जयपुर, कोटा और अन्य स्थानों पर छापेमारी की। इस दौरान 1 करोड़ 15 लाख रुपए नकद, ट्रांजेक्शन डिटेल्स, प्रॉपर्टी के दस्तावेज और अन्य कागजात बरामद किए गए। सूत्रों की मानें तो जयपुर में सी-स्कीम, मालवीय नगर और जगतपुरा में छापे की कार्रवाई कर दस्तावेज जब्त किए गए हैं। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के ठिकानों पर भी सीबीआइ ने छापेमारी की है। सीबीआइ ने यह केस 25 नवंबर को आरोपी वकील, आइटीएटी जयपुर के मेंबर और असिस्टेंट रजिस्ट्रार सहित अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज किया।
इन किसानों की सफलता का एक साझा सूत्र भी है- बेहतर किस्म का बीज चुनना. किसी भी फसल की शुरुआत बीज से होती है, इसलिए बीज जितना मजबूत होगा, फसल उतनी ही सुरक्षित और लाभकारी होगी. इन किसानों ने अपने अनुभव से यह सीखा कि विश्वसनीय कंपनी के गुणवत्तापूर्ण बीज खेती में जोखिम कम करते हैं, उत्पादन बढ़ाते हैं और बाज़ार में फसल की मांग भी मजबूत बनाते हैं.
इसी सोच के साथ इन किसानों ने समय के साथ विभिन्न बीज कंपनियों को आजमाया, पर अंत में भरोसा टिका Sakata Seeds की उन्नत किस्मों पर, खासकर ब्रोकली की ‘साकी’ किस्म और फूलगोभी की ‘व्हाइट क्रिस्टल’ पर. आइए, उन्हीं किसानों के जुबानी उनकी सफलता की कहानी के बारे में जानते हैं-
1. हिमाचल के बर्फीले इलाकों में ब्रोकली का हरा सोना – राकेश राशपा की कहानी
लाहौल–स्पीति जैसे कठिन और ठंडे इलाके में खेती करना किसी चुनौती से कम नहीं. छह महीने बर्फ से ढके रहने वाले इस क्षेत्र में फसलें कम ही पनपती हैं. लेकिन इन्हीं कठोर परिस्थितियों में एक किसान ने अपने पैरों पर खड़े होकर दिखाया कि मेहनत और दूरदृष्टि से खेती कितनी लाभकारी हो सकती है.
राकेश राशपा पिछले 15 सालों से खेती कर रहे हैं. शुरू–शुरू में वे आलू और मटर जैसी पारंपरिक फसलें उगाते थे. लेकिन जब मंडियों में इन फसलों के दाम लगातार गिरने लगे, तो उन्होंने सोचा कि क्यों न कुछ नया किया जाए. 2010 में उन्होंने पहली बार ब्रोकली की खेती का प्रयोग किया, और यह प्रयोग उनकी जिंदगी की सबसे लाभकारी दिशा साबित हुआ.
आज उनके पास कुल 5 एकड़ जमीन है, जिसमें से 3 एकड़ सिर्फ ब्रोकली की साकी किस्म को समर्पित हैं. राकेश बताते हैं, “हमारे यहां साल में एक ही बार ब्रोकली की फसल ले सकते हैं, क्योंकि आधा साल तो सिर्फ बर्फ रहती है. इसलिए बीज की गुणवत्ता बहुत मायने रखती है. साकी किस्म की खास बात यह है कि यह मजबूत रहती है और इसकी स्टोरेज क्षमता बेहतरीन है.”
स्टोरेज क्षमता राकेश जैसे किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों से दूर-दराज़ की मंडियों तक पहुंचने में समय लगता है. साकी किस्म की ब्रोकली बिना खराब हुए लंबी दूरी तय कर लेती है. यही वजह है कि राकेश को एक समय 200 रुपये किलो तक का दाम मिला. औसतन उन्हें 70 रुपये किलो मिलते हैं, जो किसी भी किसान के लिए बेहद अच्छा भाव है. उत्पादन की बात करें, तो राकेश प्रति एकड़ लगभग 10 टन ब्रोकली प्राप्त कर लेते हैं, जो उनके इलाके के हिसाब से उत्कृष्ट परिणाम है.
2. असम के अज्जुर रहमान – विविध फसलों के विशेषज्ञ, लेकिन भरोसा साकी किस्म पर
असम के दारंग जिले के किसान अज्जुर रहमान पिछले 20 वर्षों से खेती कर रहे हैं. उनकी भूमि उपजाऊ है और मौसम सब्जियों की खेती के लिए अनुकूल, इसलिए वे एक साथ कई तरह की फसलों- पत्ता गोभी, मिर्च, बैंगन, ब्रोकली और फूलगोभी की खेती करते हैं.
अज्जुर रहमान के पास कुल 4 एकड़ जमीन है, पर उनकी सक्रियता और मेहनत इतनी है कि वे साल में तीन-तीन बार फूलगोभी और ब्रोकली की फसल ले लेते हैं. फूलगोभी में उन्हें एक बीघा में 10 टन से अधिक उत्पादन मिल जाता है, जो उनके क्षेत्र के किसानों के लिए एक मानक बन चुका है.
लेकिन उनका असली अनुभव और खुशी ब्रोकली की खेती से जुड़ी है. वे प्रति चक्र लगभग 5 बीघा में ब्रोकली उगाते हैं और कई बार प्रति बीघा 9 टन तक उत्पादन प्राप्त कर चुके हैं. यह आकड़ा अपने आप में उल्लेखनीय है.
वे बताते हैं, “मैंने कई किस्में आजमाईं, लेकिन ब्रोकली की साकी किस्म से जो लगातार, मजबूत और बाजार–अनुकूल उत्पादन मिलता है, वह किसी दूसरी किस्म में नहीं मिला. इसकी मांग हमेशा बनी रहती है.”
3. उत्तर प्रदेश के मोहम्मद नासिर – 15 साल की खेती और साकाटा पर स्थायी भरोसा
सहारनपुर जिले के रहने वाले मोहम्मद नासिर पिछले 15 सालों से सब्जी उत्पादन कर रहे हैं. उनके पास 9 एकड़ जमीन है, जिस पर वे मुख्य रूप से ब्रोकली और फूलगोभी की खेती करते हैं.
नासिर का अनुभव साकाटा कंपनी के साथ लंबे समय का है. वे बताते हैं, “मैं पिछले 15 साल से साकाटा सीड्स के साथ जुड़ा हूं. ब्रोकली की साकी किस्म ने कभी निराश नहीं किया. कभी–कभी तो 500 रुपये किलो तक का भाव मिला है.”
फूलगोभी की खेती वे लगभग 4 एकड़ में करते हैं, और इस फसल में वे साकाटा की प्रसिद्ध किस्म ‘व्हाइट क्रिस्टल’ का उपयोग करते हैं. यह किस्म आकार, सफेदी, कसावट और बाजार में मांग के मामले में अव्वल है.
नासिर साल में चार बार फूलगोभी और तीन बार ब्रोकली की खेती करते हैं. यह तभी संभव हुआ है जब बीज मजबूत हो, बुवाई से लेकर कटाई तक स्थिर प्रदर्शन दे, और अलग–अलग मौसम में भी अच्छा उत्पादन करे.
उनके शब्दों में, “साकाटा के बीजों ने खेती को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद आय का स्रोत बनाया है.”
4. महाराष्ट्र के राजेंद्र सिलके – वर्षा और गर्मी के बीच स्थिर उत्पादन
नासिक जिले के प्रगतिशील किसान राजेंद्र सिलके लगभग 20 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं. उन्होंने लगभग 8 वर्ष पहले सब्जी खेती शुरू की और तभी से बेहतर किस्म के बीज चुनने पर जोर दिया. राजेंद्र मुख्य रूप से ब्रोकली की ही खेती करते हैं और साकाटा की साकी किस्म उनके खेत की पहचान बन चुकी है. वे बताते हैं कि वे जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों का संतुलित उपयोग करते हैं ताकि उत्पादन और मिट्टी की सेहत दोनों ठीक रहें.
उन्हें प्रति एकड़ लगभग 7 टन उत्पादन मिलता है. महाराष्ट्र जैसे राज्य में, जहां मानसून अनिश्चित है और नमी का स्तर अक्सर बदलता रहता है, साकी किस्म का स्थिर प्रदर्शन किसानों के लिए राहत की बात है.
राजेंद्र कहते हैं, “साकी किस्म बारिश में भी खराब नहीं होती. हेड की मजबूती और स्टोरेज क्षमता बहुत अच्छी है. यही वजह है कि मैं पिछले कई सालों से इसी बीज का उपयोग कर रहा हूं.”
साकाटा सीड्स – किसानों के अनुभवों से बना भरोसा
इन चारों किसानों की भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं- कहीं बर्फ़ है, कहीं लगातार बारिश, कहीं गर्मी और कहीं नमी. लेकिन सभी किसानों का अनुभव एक बात पर एकजुट है:- “उन्नत किस्मों का बीज खेती में बदलाव ला सकता है.”
ब्रोकली की साकी किस्म की खासियतें, जिन्हें किसानों ने अपने अनुभव से साबित किया है-
- मजबूत पौधे
- बेहतरीन स्टोरेज क्षमता
- परिवहन के दौरान खराब न होना
- बेहतर आकार और कसावट
- विभिन्न मौसमों में स्थिर प्रदर्शन
- मंडियों में अच्छा मूल्य
फूलगोभी की व्हाइट क्रिस्टल किस्म की खूबियां-
- आकर्षक सफेदी
- कसावदार हेड
- अच्छी शेल्फ लाइफ़
- सभी मौसमों में अनुकूलता
ये सब कारण हैं कि ये किस्में किसानों की पहली पसंद बन गई हैं.
किसानों की कहानी हमेशा मिट्टी से शुरू होकर आशा पर खत्म होती है. राकेश, अज्जुर, नासिर और राजेंद्र, ये चारों किसान दिखाते हैं कि भारत में कृषि सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि संभावनाओं से भरा क्षेत्र है. उन्होंने अपनी दूरदर्शिता, मेहनत और सही निर्णयों के बल पर साबित किया कि खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है. उनकी कहानी यह भी बताती है कि बीज सिर्फ फसल का शुरुआती बिंदु नहीं है, बल्कि पूरे सफलता की नींव है.
साकाटा सीड्स की उन्नत किस्मों ने इन किसानों को स्थिर उत्पादन, बेहतर बाजार मूल्य और भरोसेमंद गुणवत्ता दी, और यही वजह है कि आज ये किसान अपने-अपने क्षेत्रों में प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं.
