Home खेती किसानी *चंदौली के धान किसानों की उम्मीदें भी बाढ़ की मार में डूबीं*

*चंदौली के धान किसानों की उम्मीदें भी बाढ़ की मार में डूबीं*

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उत्तर प्रदेश के चंदौली ज़िले के शहाबगंज प्रखंड से लगभग सात किलोमीटर दक्षिण दिशा में बसा है बसाढ़ी गांव। एक ऐसा गांव, जो बीते कुछ दिनों की भीषण बारिश और बाढ़ के बाद अब धीरे-धीरे अपने ज़ख्म समेट रहा है। पानी तो उतर गया है, लेकिन जो कुछ बह गया, उसका नामोनिशान तक नहीं बचा। मिट्टी के घरों की दीवारें अब सिर्फ कीचड़ के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं और लोगों के चेहरे पर चुप्पी की मोटी परत जम गई है-जैसे किसी ने जीवन की रफ़्तार पर विराम लगा दिया हो।

विजय विनीत

बसाढ़ी गांव में लियाकत (48 वर्ष) और बुजुर्ग  जमीला (70 वर्ष) का घर पूरी तरह ढह गया। उनके पास कुछ नहीं बचा। न बिस्तर, न बर्तन, न कपड़े। जमीला की झुर्रियों में अब सिर्फ बेबसी का सागर है। वह कहती हैं, “बिटवा, घर गवा देहनी, अब का करीं… रात में ठंड लागे तो लगत है जियs बंद हो जाई…” उनकी आवाज़ में ऐसी थकान है, मानो समय ने उनसे जीने की वजह भी छीन ली हो। उनके पास खड़ी उनके परिवार की एक बच्ची कहती है,”खाने को कुछ नहीं मिल रहा है।” उसके पूरे शरीर में दाने निकल आए हैं। —कहती हैं, ”भूखी है। हमें खाना ही नहीं मिल रहा है तो बच्चों के लिए छाती में दूध कैसे उतरेगा।”

पास ही राजू पुत्र जैनुल का घर भी मिट्टी में मिल गया। हीरा राय पुत्र मजनू (45 वर्ष) का हाल भी कुछ ऐसा ही है। दीवारें झुक गईं, छतें धंस गईं और अब सिर्फ खुला आसमान है सिर पर। चारों ओर फैले मलबे के बीच उनके बच्चों की आंखों में डर और भूख साथ-साथ दिखती है। बाढ़ पीड़ितों की बस एक ही पुकार है, “अब कहाँ जाएं?” लेकिन जवाब में सिर्फ सन्नाटा है।

उजड़ गई पूरी दुनिया।

बसाढ़ी गांव में अब तक कोई अफसर नहीं आया। सिर्फ इलाकाई लेखपाल पहुंचे, लेकिन किसी को राहत की रकम नहीं मिली। लियाकत और जमीला को फिलहाल गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में शरण दी गई है। वही अब उनका अस्थायी घर है। दीवारों पर बच्चों की बनाई रंगीन चित्रकारी के बीच बुजुर्ग जमीला अपने टूटे सपनों को समेटे बैठी हैं। उनके लिए यह केंद्र अब किसी मंदिर से कम नहीं, जहां जीवन की लौ बस किसी तरह टिमटिमा रही है।

ग्राम प्रधान मनोहर केशरी ने अपने स्तर पर बाढ़ पीड़ितों को राहत सामग्री-कुछ प्लास्टिक की चादरें दी हैं। लेकिन ये चादरें भी अब टूटी ज़िंदगियों को ढकने में नाकाफी हैं। बरसात के साथ आई यह त्रासदी बसाढ़ी के हर घर की कहानी बन गई है, जहां हर चेहरा एक दर्द बयान कर रहा है। ग्रामीणों ने आवास के लिए कई मर्तबा अर्जी दी है, लेकिन अभी तक किसी को कोई जवाब नहीं मिला। सरकारी मशीनरी के आने की उम्मीद में गांव के लोग हर आने-जाने वाले को टकटकी लगाकर देखते हैं-शायद कोई मदद का हाथ बढ़े, शायद कोई सुने।

कैसे बढ़ेगी आगे जिंदगी?

बसाढ़ी अब सिर्फ एक गांव नहीं रहा, यह एक प्रतीक बन गया है। उस संघर्ष का, जहां इंसान प्रकृति और व्यवस्था दोनों से जूझ रहा है। यहां हर टूटा घर, हर भीगा बिस्तर और हर कांपता चेहरा एक सवाल बनकर सरकार से पूछ रहा है, “क्या हमें जीने का हक़ नहीं?”

दरअसल, बसाढ़ी की पीड़ा कोई अकेली कहानी नहीं है। बाढ़ का यह कहर समूचे चंदौली जिले में है। चंदौली सदर प्रखंड और आसपास के इलाकों में बाढ़ ने कहर बरपाया है। जरखोर, जगदीशपुर, भटपुरवा, केवटी, पम्हटी, त्रिभुवनपुर, गोरारी, बड़केगांव (दूदे), नगईं, अकोढ़ा, सलेमपुर, खुरुहजा, सिकरी, पड़या, चोरमुली जैसे गांव पूरी तरह प्रभावित हैं।

वहीं नियामताबाद प्रखंड में चोरमरवां, पचोखर, चंदाइत, हसनपुर खमरिया और महदेउर गांवों की स्थिति भी गंभीर बनी हुई है। इन गांवों में खेतों में खड़ी धान की फसलें जलमग्न होकर सड़ चुकी हैं। किसानों की मेहनत और उम्मीदें बह गईं। किसी के पास बीज बचा नहीं, तो किसी के पास खेत तक जाने का रास्ता नहीं रहा। मिट्टी के मकान ढह गए हैं, बिजली के खंभे गिर गए हैं, और अब भी कई इलाकों में कीचड़ और मलबा पसरा हुआ है।

मौत का रास्ता।

जरखोर गांव की दलित बस्ती में 40 वर्षीया सुनीता सड़क के किनारे लगे हैंडपंप पर पानी भरने के लिए निकलीं। चपाकल से पानी भरते-भरते वो अचानक रुआंसी नजर आईं। हैंडपंप पानी की जगह कीचड़ उगल रहा था। इनके साथ गांव की कुछ और महिलाएं पानी भरने आई थीं। बाढ़ से हुई तबाही का जिक्र करते हुए सुनीता भावुक हो जाती हैं। वह कहती हैं, —हमें पानी की बहुत परेशानी है। करीब डेढ़ सौ की आबादी में हैंडपंप गंदा पानी उगल रहे हैं। बाढ़ का पानी उतर गया है, लेकिन मुसीबत बढ़ गई है। घर टूटा, अनाज सड़ गया और अब पेट पालने की चिंता है।”

जगदीशपुर और त्रिभुवनपुर के कई परिवार स्कूलों और पंचायत भवनों में शरण लिए हुए हैं। केवटी और पम्हटी के बच्चे अब मिट्टी में खेलने की बजाय गंदे पानी में रास्ता तलाश रहे हैं। नगईं और अकोढ़ा के लोग कहते हैं कि सरकारी मदद सिर्फ कागज़ों पर आई है, ज़मीन पर नहीं। प्रधानमंत्री आवास योजना, आपदा राहत फंड और राजस्व विभाग की सर्वे टीमों की चर्चा तो हर जगह है, लेकिन अब तक बहुत कम परिवारों तक राहत पहुंची है। गांव के लोग कहते हैं, “नाम लिखा गया है, लेकिन सहायता का नामोनिशान नहीं।”

हर तरफ तबाही का मंजर

चंदौली से करीब 20 किलोमीटर दूर शहाबगंज प्रखंड का खखड़ा गांव बाढ़ की चपेट में है। यहां रामू और संतोष का घर चारों तरफ पानी से घिर गया है। खाने-पीने और जरूरी सामान लाना मुश्किल हो गया है। मिट्टी के घरों में रहने वाले लोग अब प्लास्टिक डालकर अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने आवास देने की बात कही थी, लेकिन राहत कार्य अभी तक पूरी तरह नहीं पहुंचा है। गांव में पंप लगाने की योजना बनाई जा रही है, लेकिन तबाही की तस्वीर कुछ और ही कह रही है।

बाढ़ में कई घर तबाह

इलिया थाना क्षेत्र के गोविंदीपुर गांव में शनिवार की सुबह एक दर्दनाक हादसे ने पूरे गांव को शोक में डुबो दिया। लगातार दो दिनों से हो रही बारिश ने गांव की मिट्टी को इतना कमजोर कर दिया था कि ऊंचे डीह (टीले) की मिट्टी धीरे-धीरे खिसकने लगी। ग्रामीणों ने सोचा भी नहीं था कि यह हल्की सी ढलान कुछ ही पलों में किसी की जान ले लेगी। सुबह अचानक मिट्टी का एक बड़ा हिस्सा ढह गया और पास में बने एक मिट्टी के शेड की दीवार पर जा गिरा। दबाव इतना तेज़ था कि दीवार पलभर में ढह गई। उसके मलबे में गांव के 60 वर्षीय निवासी मुनीब यादव दब गए। जब तक ग्रामीण दौड़कर पहुंचे और मलबा हटाने लगे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मुनीब यादव अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनका निढाल शरीर मलबे के नीचे से निकला तो गांव की गलियों में मातम फैल गया। किसी के आंगन से चीखें उठीं, किसी की आंखें नम हो गईं। बुजुर्ग मुनीब, जो गांव के हर दुख-सुख में साथ खड़े रहते थे, अब खुद मिट्टी में समा गए। प्रशासनिक औपचारिकताओं से परे, गांव में पसरा सन्नाटा बहुत कुछ कह रहा है। मुनीब यादव की मौत ने पूरे गांव को गमगीन कर दिया है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव के लोग अब भी विश्वास नहीं कर पा रहे कि जिस मिट्टी को वे घर का हिस्सा मानते थे, वही आज मौत का सबब बन गई।

उजड़ गयी पूरी दुनिया।

शहाबगंज प्रखंड के करनौल के कमलेश राम की भैस उनका घर गिरने से दबकर मर गई। कमलेश ने बताया, “गांव के चारों तरफ पानी भर गया है। कच्चे मकान गिर चुके हैं, लोग बेघर हो गए हैं। खेतों में धान की फसल सड़ गई है। पांच-छह दिनों से पानी जमा है, धान अब पक नहीं सकता। बच्चे भूखे हैं, घरों में खाने का सामान तक नहीं बचा। कपड़े और बिस्तर सब बह गए।” अरसीपुर गांव की एक महिला सीता (बदला नाम) ने रोते हुए कहा, “हमारा घर गिर गया है, रहने की कोई जगह नहीं है। बच्चों के पास पहनने को कपड़े नहीं हैं, खाने को कुछ नहीं है। खेत की फसल पूरी सड़ चुकी है। सरकार से गुहार है कि तुरंत मदद दी जाए।” कुछ ऐसी ही कहानी भूंसी गांव की है।

सुमारू बिंद, जो ग्राम रोहणा के निवासी हैं, बताते हैं, “पूरे गांव में पानी घुस गया है। गली-कूचों में आना-जाना मुश्किल है। जो फसल तैयार थी, वो भी गल गई। छोटे बच्चों के साथ जीना दूभर हो गया है। प्रशासनिक मदद अभी तक नहीं मिली है। हम सरकार से राहत और मुआवजे की मांग करते हैं।”

ग्रामीण इलाकों में लोगों के घरों में पानी भरा है, रास्ते टूट गए हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। लोग छतों और ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं। प्रशासन के प्रयासों के बावजूद राहत अब तक नाकाफी साबित हो रही है। ग्रामीणों का दर्द साफ है, “सब कुछ डूब गया है, बस उम्मीद ही बची है कि सरकार हमारी पुकार सुने।”

जर्जर हुआ बादशाह पुल।

मुजफ्फरपुर, ठाकुरवारी और चकिया ब्लॉक के दिरेहू क्षेत्र में जलजमाव ने लोगों की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है। लोग पानी और कीचड़ से गुजरने में असमर्थ हैं, आने-जाने का हर रास्ता मुश्किल भरा है। कई और गांवों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। सरैया, बसाड़ी और आसपास के गांव पूरी तरह पानी में डूबे हुए हैं। रसिया निवासी चौकिर अहमद का कहना है कि उनकी बीस लाख की मछलियां बह गईं। ढहे हुए घरों में 90 प्रतिशत लोग मिट्टी के घरों में रह रहे थे। केवल एक दिन की बारिश ने ही सरकार के “छत मुहैया कराने” के दावे की पोल खोल दी है। लगातार बारिश होती तो तबाही का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था।

चंदौली जिले में बाढ़ से तबाही का मंजर सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि हर गलियों, हर घर और हर परिवार में नजर आता है, जहां लोग बेसहारा होकर पानी और कीचड़ में जूझ रहे हैं। नियामताबाद प्रखंड में गड़ी नदी के किनारे बसे दलित अतिपिछड़े तबके के गांव हसनपुर, मछरिया, कम्हरिया, अरबंदापुर, डिहुरिया पर में बाढ़ की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक रही।

बारिश और बाढ़ से कर्मनाशा का पानी और गड़ई नदियों के उफान पर होने की वजह से स्थिति भयावह हो गई।

रोड चौड़ीककरण होने के कारण पुलिया भी क्षतिग्रस्त हो गई है। पुलिया अभी तक बन नहीं सकी है। चोरमरवा गांव के पास कमर तक पानी लगा था। अभी भी पानी जमा हुआ है। कई गांवों अभी तक पानी से घिरे हुए हैं। बबुरी के पास गड़ई नदी का इतना तेज बहाव था कि एक स्कूली बस बहने से बच गई। ग्रामीणों ने शीशा तोड़कर बच्चों को बाहर निकाला।

चंदौली से सटे पड़यां गांव और बबुरी गड़ई नदी पर आदमियों को ढोने के लिए 20-20 रुपये वसूले गए। बाइक ढोने के लिए 50-50 रुपये वसूले गए। एक दिन की बारिश ने सरकारी योजनाओं के विकास का पोल खोलकर रख दिया। कई स्थानों पर लोग फंसे हुए हैं। पांच फीट पानी भरी सड़कों पर अब रिक्शा चालक पैसे लेकर वाहनों को धकेल कर पार करा रहे हैं। यह मजबूरी का व्यापार है, जिसे देखकर मन विचलित हो उठता है।

घर की चपेट में आ गयी भैंस।

बाढ़ से प्रभावित ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है शौच की। महिलाओं के लिए शौच करना तक मुश्किल हो गया है। अगर किसी महिला अथवा बच्ची के माहवारी या पीरियड शुरू हो जाए तो उसका कोई इंतज़ाम नहीं दिखता। चिकित्सीय कैंप में भी सैनिटरी पैड जैसी कोई व्यवस्था नहीं हैं। ऐसे समय में जब महिलाएं अपने साथ बहुत कम कपड़े ला पाईं हो तो माहवारी का संकट और बड़ा हो गया है। उनके पास पुराने कपड़े इस्तेमाल करने का विकल्प भी नहीं है। 20 साल की गुंजन (बदला हुआ नाम) जनचौक से कहती हैं, ”किसी तरह एडजस्ट करना पड़ता है। कोई उपाय नहीं है, हम लोगों के पास।”

क्यों कराह रहा धान का कटोरा

पूर्वांचल के चंदौली जिले को अक्सर “धान का कटोरा” कहा जाता है, क्योंकि यहां की उपजाऊ धरती से हर साल सोने सी चमकती धान की बालियां लहलहाती हैं। इस बार प्रकृति की मार ने इस कटोरे को पानी से भर दिया है-बाढ़ के पानी से। भारी बारिश और चार बड़े बांधों-मूसाखाड़, चंद्रप्रभा, नौगढ़ और भैसौड़ा।

तलीफशाह बियर से होते हुए कई बांधों का पानी सैकड़ों गांवों में घुस गया। सोनभद्र के नगवां बांध से 22 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया है, जिससे बबुरी क्षेत्र के निचले इलाकों को जलमग्न कर दिया है। गरई, चंद्रप्रभा और कर्मनाशा नदिया उफनाने लगीं। खेतों में खड़ी फसलें डूब चुकी हैं, सड़कें नदियों में बदल गई हैं और लोगों का जनजीवन ठहर-सा गया है।

तबाही की बाढ़।

चंदौली में हुई मूसलाधार बारिश ने पिछले वर्षों के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इसके चलते मूसाखाड़ बांध के आठ गेट खोल दिए गए हैं, जिससे लगभग 45 हजार क्यूसेक पानी कर्मनाशा नदी में छोड़ा गया है। चंद्रप्रभा और नगवां डैम से भी लगातार पानी छोड़ा जा रहा है, जिसके चलते बबुरी, चकिया, नौगढ़ से लगायत नियामताबाद इलाके के कई गांवों में बाढ़ का पानी फैल चुका है। चंद्रप्रभा नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया कि पंडित दीनदयाल नगर से चकिया को जोड़ने वाले पुल के ऊपर से पानी बहने लगा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने इस मार्ग पर आवागमन पूरी तरह रोक दिया है ताकि किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके।

सबसे अधिक संकट बबुरी थाना क्षेत्र के नगई, नेकनामपुर, नवाबपुर, दुदे और बसई गांवों में देखा जा रहा है। यहां कई घरों में पानी घुस चुका है, लोग घर छोड़ने को मजबूर हैं। पुलिस और प्रशासन की टीमें नावों, ट्रैक्टरों और गाड़ियों की मदद से लगातार रेस्क्यू कार्य कर रही हैं।

इसी बीच मनसा देवी, जो अपने परिवार सहित फंसी हुई थीं। उन्होंने बताया कि उनके घर में पानी भर गया था। उनका दस दिन का शिशु और परिवार की एक गर्भवती महिला भी घर में मौजूद थीं। पुलिस और प्रशासन ने समय रहते उन्हें बाहर निकालकर राहत शिविर में पहुंचाया। चंदौली जिला प्रशासन का दावा है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है। खाद्य सामग्री, दवा और पीने के पानी की आपूर्ति के लिए शिविर भी स्थापित किए गए हैं।

पानी में डूबे खेत और सड़कें

पड़यां गांव के पास की सड़क अब नदी का रूप ले चुकी है। यहां पांच फीट तक पानी भरा है, जिससे आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है। कुछ किसानों की धान की फसलें पकने लगी थीं, लेकिन अब खेतों में केवल पानी की लहरें हैं। हजारों बीघा फसल बर्बाद हो चुकी है। किसान अपने खेतों के किनारे खड़े होकर केवल आकाश की ओर देख रहे हैं।

सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ी है। जिन खेतों में कुछ ही दिनों में फसल कटने वाली थी, वे अब पानी में समा गए हैं। “साल भर की मेहनत एक रात में बह गई,” पडया गांव के किसान रामनाथ कहते हैं, “अब घर कैसे चलेगा?” चंदौली के रोहणा, नरना, महादेव, खरगीपुर और देवई गांवों की स्थिति बेहद खराब है। पानी का स्तर कम नहीं हुआ है। फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं। कई मकान गिर गए हैं और जान-माल का खतरा बना हुआ है।

उतरौत गांव के प्रधान महेंद्र मौर्य कहते हैं, “यह केवल प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि एक किसान की टूटी उम्मीदों का आईना है, जहां खेत पानी में डूबे हैं, और आसमान में अब भी बादल मंडरा रहे हैं। शायद अब ऊपरवाला ही कुछ कर सके। बबुरी, नगवां, नौगढ़, कनहरा और खोरी गांवों में लोग अपने घरों को छोड़कर ऊंचे स्थानों या प्राथमिक विद्यालयों में शरण लिए हुए हैं। पशुओं को बांधने की जगह नहीं बची। कई लोग नाव या ट्रैक्टर ट्रॉली से गांवों के बीच आवाजाही कर रहे हैं।”

फिर भी, ग्रामीणों का कहना है कि अरौराबाद से अत्यधिक मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण हालात बिगड़ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जल निकासी में लापरवाही बरती जा रही है, जिसके चलते स्थिति दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही है। किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग की गई है, क्योंकि चंदौली जिले की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर है और धान की फसल बर्बाद हो चुकी है।

घरों में घुसा पानी

मुगलसराय के  विधायक रमेश जायसवाल ने बनारस में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चंदौली में आई बाढ़ की स्थिति से अवगत कराया है और एक पत्र भी सौंपा है। मुख्यमंत्री ने मंडलायुक्त को तत्काल रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं। जिला प्रशासन का दावा है कि सभी ब्लॉक मुख्यालयों पर राहत चौकियां खोली गई हैं। भोजन पैकेट वितरण की व्यवस्था की गई है और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद हैं।

बाढ़ में डूबे स्कूल, ठप हुई पढ़ाई

चंदौली जिले में इस बार की बारिश ने न सिर्फ खेतों और घरों को डुबोया, बल्कि बच्चों के सपनों को भी बहा दिया। अमर उजाला की एक रिपोर्ट बताती है कि पूरे जिले के 13 विद्यालयों में बारिश और सीवर का गंदा पानी भर गया है, जिनमें से 9 विद्यालय पूरी तरह बंद हैं। बाकी चार स्कूलों में बच्चे और शिक्षक रोज़ाना कमर तक गंदे पानी से होकर स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं। यह कोई नई कहानी नहीं है-हर साल यही दर्द, यही लापरवाही और वही इंतज़ार।

शहाबगंज प्रखंड के कंपोजिट विद्यालय शहाबगंज में हालात बेहद खराब हैं। विद्यालय परिसर चारों ओर से पानी से घिर गया है। बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना अब किसी परीक्षा से कम नहीं। प्रधानाध्यापिका बबिता बताती हैं, “पानी निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। चारों तरफ गंदा पानी भरा है। बच्चों में बीमारी फैलने का डर बढ़ गया है। प्रशासन को कई बार बताया गया, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।”

नियामताबाद ब्लॉक के शिवनाथपुर, चंदाइत, उसडौरी, तकिया, पचोखर, हसनपुर कम्हरिया, रोहणा, नरैना और महदेऊर गांवों के विद्यालयों में हालात इतने खराब हैं कि पठन-पाठन पूरी तरह ठप है। शिक्षक अब सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में बैठने को विवश हैं। दूसरी ओर, कंदवा क्षेत्र के देवा गांव में पीएमश्री कंपोजिट विद्यालय तक जाने का रास्ता तक नहीं बनाया गया। बारिश के दौरान बच्चे और शिक्षक कीचड़ और पानी से भरे खेतों से होकर स्कूल पहुंचते हैं। शिक्षक अपनी मोटरसाइकिलें दो सौ मीटर दूर खड़ी करके नंगे पांव स्कूल तक जाते हैं।

घर में घुसा पानी

दुलहीपुर बीपी हायर सेकेंड्री स्कूल की स्थिति तो और भयावह है। यहां बारिश के साथ-साथ आसपास के गांवों का सीवर भी स्कूल में भर गया है। प्रधानाचार्य किशोर कुमार कहते हैं,“पिछले डेढ़ दशक से हर साल अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पत्र भेजते हैं, लेकिन कोई झांकने तक नहीं आता। अब गेट से लेकर कक्षा तक घुटनों तक पानी है। छात्राएं डर-डर कर आती हैं, कई तो लौट भी जाती हैं।”

इलिया क्षेत्र के बराव गांव का कंपोजिट विद्यालय भी जलमग्न है। मुख्य द्वार से लेकर कक्षाओं तक कीचड़ और पानी ही पानी। प्रधानाध्यापक संजय कुमार निराला बताते हैं कि “लगातार शिकायतों के बावजूद निकासी की कोई व्यवस्था नहीं की गई। बारिश थम गई, लेकिन पानी अभी तक नहीं निकला।”

ग्राम प्रधान अभय सिंह का कहना है, “विद्यालय की चारदीवारी अराजक तत्वों ने तोड़ दी थी, जिससे बाहर का सीवर स्कूल में भर जाता है। अब तो हालात नारकीय हो चुके हैं। बच्चे और शिक्षक दोनों मजबूरी में आ-जा रहे हैं।” यह दृश्य किसी एक विद्यालय का नहीं, बल्कि पूरे जिले की बदहाली की तस्वीर है। स्कूलों में बच्चों के लिए किताबों की जगह गंदे पानी की बदबू है, और खेल के मैदान की जगह कीचड़ का दलदल।

इसी बीच, कर्मनाशा नदी पर बना पुराना पुल भी इस बार की बारिश में टूटने की कगार पर पहुंच गया। शुक्रवार को तेज़ बारिश में नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया कि पानी पुल के ऊपर से बहने लगा। पहले से क्षतिग्रस्त रेलिंगें अब पूरी तरह टूट चुकी हैं। नतीजा-आवागमन ठप, व्यापार ठप, और गरीबों की रोज़ी-रोटी पर संकट। स्थानीय दुकानदार सोनू, सब्बल, रमेश, रहीमुद्दीन और मल्लर कहते हैं, “अगर जल्द पुल की मरम्मत नहीं हुई, तो हम भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे। बारिश ने घर छीने, अब रोटी भी छीन रही है।”

नियामताबाद, चंदाईत, और सदर ब्लॉक के प्रभावित किसानों ने कहा कि सड़क निर्माण के चलते जिस तरह नदी और नालों के प्रवाह को रोका गया, उसने अब उनकी पूरी जीविका को संकट में डाल दिया है। खेतों में पानी भरा होने से न केवल धान की फसल बर्बाद हो गई है, बल्कि रबी की बुवाई की संभावना भी समाप्त होती दिख रही है। अधिकारी मौके पर तो आते हैं, फोटो खिंचवाकर लौट जाते हैं, लेकिन अब तक किसी ने नुकसान का वास्तविक सर्वे या मुआवजे की प्रक्रिया शुरू नहीं की है। लोगों में नाराज़गी गहराती जा रही है और कई जगहों पर ग्रामीण प्रदर्शन की तैयारी भी कर रहे हैं।

ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष आनंद सिंह कहते हैं, “चंदौली की धरती आज सिर्फ़ जलमग्न नहीं है, बल्कि उन लोगों के आंसुओं से भी भीगी है जो सरकारी लापरवाही और असमानता की मार झेल रहे हैं। यह बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि किसानों की वर्षों की मेहनत और उनके सपनों पर लगी गहरी चोट है। अगर राहत और बचाव के ठोस उपाय तुरंत नहीं किए गए, तो यह संकट फसल से लेकर जीवन तक को डुबो सकता है। यह बाढ़ केवल पानी का उफान नहीं, बल्कि उम्मीदों, सपनों और भरोसे का बहाव भी थी।”

बाढ़ग्रस्त कई गांवों का दौरा करने के बाद आनंद सिंह ने बताया कि दूषित पानी और मच्छरों के बढ़ते प्रकोप से डायरिया, बुखार और त्वचा रोगों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमें कभी-कभार तो दिखाई देती हैं, लेकिन न तो नियमित जांच की व्यवस्था है और न ही दवाओं का स्थायी वितरण।

आनंद ने कहा, “बाढ़ प्रभावित लोग केवल मुआवजे की नहीं, बल्कि स्थायी पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाले दिनों में खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार-तीनों मोर्चों पर भयावह रूप ले सकता है। लगातार बारिश के कारण कई घरों की मिट्टी की दीवारें कमजोर हो चुकी हैं, जो कभी भी ढह सकती हैं। प्रशासन को चाहिए कि वो कमजोर मकानों का त्वरित सर्वे कराकर ज़रूरी कदम उठाए जाएं, ताकि कोई नई त्रासदी जन्म न ले।”

“बाढ़ नहीं व्यवस्था की विफलता”

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (एआईपीएफ) के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अजय राय ने चंदौली की बाढ़ को लेकर एक बेहद दर्दभरी लेकिन सच्ची तस्वीर सामने रखी। उनका कहना है,“यह बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती, यह हर साल हमारी नाकामी का आईना दिखा जाती है।

चंदौली की यह हालत किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि उस टूटी व्यवस्था की है जो हर बारिश में बह जाती है। यहां बाढ़ बच्चों के सपनों, शिक्षकों की मेहनत और आम लोगों की उम्मीदों को डुबो देती है। इस बार की बाढ़ ने ग्रामीणों की ज़िंदगी को अंदर तक हिला दिया है। जिन कच्चे घरों में लोग वर्षों से रहते आए थे, अब वही घर उनके लिए डर का प्रतीक बन गए हैं। अब लोग अपनी ही मिट्टी से डरने लगे हैं, क्योंकि यह मिट्टी अब आश्रय नहीं, खतरा बन गई है।”

उनकी आवाज़ भर्रा जाती है जब वे गोविंदीपुर गांव की घटना का ज़िक्र करते हैं, “कितनी विडंबना है कि जब आसमान बरस रहा था, तब धरती ने अपने ही बेटे को निगल लिया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।”

अजय राय का आरोप है कि प्रशासन के पास न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही कोई ठोस योजना। “बेलावर बंधी दिनों से रिस रही है, लेकिन इसे बंद करने की कोशिश अब तक अधूरी है। अतायसगंज के पास साइफन टूट जाने से लोगों का आवागमन ठप है। लोग रोज़ाना जान जोखिम में डालकर रास्ता पार कर रहे हैं, जबकि प्रखंड के अधिकारी अब जाकर जागे हैं और मरम्मत का काम शुरू हुआ है।” वे आगे कहते हैं, “नहरों की सफाई नहीं होने से पानी का निकास पूरी तरह बाधित हो गया। अगर समय रहते नहरें साफ कर दी जातीं, तो शायद यह बाढ़ इतना कहर नहीं बरपाती।”

अजय राय ने भारतमाला परियोजना को भी बाढ़ की तबाही के पीछे एक बड़ा कारण बताया। उनके अनुसार, “सड़क निर्माण के नाम पर जगह-जगह रास्तों को तहस-नहस कर दिया गया है। जलनिकासी के मार्ग बंद हो गए हैं। नतीजा यह हुआ कि बारिश का पानी गांवों की गलियों में भर गया और खेतों से होते हुए लोगों के घरों तक पहुंच गया।” उनके शब्दों में एक गहरी पीड़ा झलकती है, “चंदौली की मिट्टी कभी उपजाऊ थी, अब वही मिट्टी लोगों के जीवन पर बोझ बन गई है। यह बाढ़ नहीं, यह लापरवाही का सैलाब है। जब तक व्यवस्था नहीं सुधरेगी, तब तक हर बरसात में कोई न कोई ‘गोविंदीपुर’ मिट्टी में समाता रहेगा।”

गडकरी को लिखा चेतावनी भरी चिट्ठी

पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में लगातार जारी बाढ़ संकट के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद वीरेंद्र सिंह ने केंद्र सरकार की भारतमाला परियोजना के ठेकेदारों और निर्माण एजेंसियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सांसद ने इस मामले में सीधे केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को एक तीखे और चेतावनी भरे अंदाज़ में पत्र लिखकर जवाबदेही तय करने की मांग की है।

सांसद वीरेंद्र सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि भारतमाला परियोजना के अंतर्गत चंदौली जिले में हो रहे सड़क निर्माण कार्यों में ठेकेदारों और एजेंसियों ने भारी अनियमितताएं की हैं। उनके अनुसार, निर्माण कार्यों में तकनीकी मानकों की अनदेखी और प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों को बाधित करने के कारण जिले के नियामताबाद और सदर ब्लॉक में इस वर्ष भयंकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

उन्होंने लिखा है कि सड़क निर्माण के दौरान एजेंसियों ने चंदप्रभा नदी के प्रवाह मार्ग को काट दिया, ताकि उनकी मशीनें और वाहन आसानी से नदी पार कर सकें। यह अस्थायी व्यवस्था अब एक स्थायी अवरोध में बदल गई है, जिसने नदी के प्राकृतिक बहाव को पूरी तरह रोक दिया है। परिणामस्वरूप, बारिश का पानी निकल नहीं पा रहा और गांवों, खेतों और घरों में जलभराव की स्थिति बन गई है।

सांसद के अनुसार, इस लापरवाही का सीधा असर किसानों पर पड़ा है। नियामताबाद और चंदौली विकासखंड में हजारों एकड़ धान की फसलें डूबकर चौपट हो गई हैं। किसानों को करोड़ों रुपये के नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। बाढ़ का पानी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहा। कई गांवों में कच्चे और पक्के मकान ढह गए हैं, पशुधन हानि हुई है और लोग बेघर हो गए हैं।

सांसद वीरेंद्र सिंह ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि इस त्रासदी ने किसानों की आजीविका पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। खेतों में पानी भर जाने से खेती लायक भूमि लंबे समय तक अनुपयोगी बनी रहेगी। उन्होंने इस स्थिति को “मानवजनित आपदा” बताते हुए कहा कि यह पूरी तरह से निर्माण एजेंसियों की लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का परिणाम है। सांसद ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से आग्रह किया है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और जिन ठेकेदारों या अधिकारियों की लापरवाही से यह स्थिति पैदा हुई है, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

सांसद वीरेंद्र सिंह का का कहना है कि यह बाढ़ किसी प्राकृतिक कारण से नहीं, बल्कि गलत इंजीनियरिंग और लापरवाह निर्माण पद्धति का परिणाम है। भारतमाला जैसी परियोजनाओं में निर्माण कार्य शुरू करने से पहले स्थानीय भौगोलिक स्थिति, जलनिकासी मार्गों और पर्यावरणीय प्रभावों का गहन अध्ययन अनिवार्य किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर इस प्रकार की अनदेखी जारी रही, तो आने वाले वर्षों में चंदौली जैसे जिलों में हर मानसून में यही त्रासदी दोहराई जाएगी।

सपा सांसद के इस पत्र ने चंदौली के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं। जिन इलाकों में बाढ़ और जलभराव की स्थिति सबसे गंभीर है, वहां न तो राहत शिविरों की कोई प्रभावी व्यवस्था की गई है और न ही पशुचारे और दवा की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। कई गांवों में पेयजल और बिजली की आपूर्ति ठप है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब सड़ांध और संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। लोग सरकार से तत्काल स्वास्थ्य शिविर लगाने और कीटाणुनाशक छिड़काव की मांग कर रहे हैं।

सांसद के इस पत्र के बाद अब स्थानीय राजनीति में भी हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने इसे ‘विकास के नाम पर विनाश’ की मिसाल बताया है। वहीं, कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं का कहना है कि “परियोजना राष्ट्रीय महत्व की है, लेकिन अगर कार्य में लापरवाही हुई है तो जांच जरूर होनी चाहिए। भारतमाला जैसी परियोजनाओं में यदि पर्यावरणीय और भौगोलिक आकलन की अनदेखी होती है, तो ऐसी आपदाएं बार-बार सामने आती रहेंगी।

ग्रामीण अब उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सांसद की चेतावनी के बाद केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन तुरंत हरकत में आएंगे। लोग चाहते हैं कि प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण, जलनिकासी और राहत मुआवजे की ठोस योजना लागू की जाए। यदि आने वाले दिनों में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि नीतिगत असफलता का उदाहरण बन जाएगा। सांसद वीरेंद्र सिंह का यह रुख न सिर्फ किसानों की आवाज़ को ताकत देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अब जनप्रतिनिधि भी सरकारी उदासीनता पर सवाल उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं) 

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