*किसानों की समस्याओं और मांगों ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी*

0
290

किसानों ने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कई विद्रोह किए

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में किसानों की भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण थी। किसान सिर्फ आंदोलन का हिस्सा नहीं थे, बल्कि कई आंदोलनों का केंद्र बिंदु थे। उनका संघर्ष मुख्य रूप से ब्रिटिश सरकार और जमींदारों, दोनों के शोषण के खिलाफ था। किसानों की समस्याओं और मांगों ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और उसे जन-आंदोलन का रूप दिया।

यहाँ कुछ प्रमुख तरीके दिए गए हैं जिनसे किसानों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया:

1. किसान आंदोलन और विद्रोह

किसानों ने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कई विद्रोह किए। ये विद्रोह अक्सर स्थानीय स्तर पर शुरू होते थे, लेकिन बाद में राष्ट्रीय नेताओं ने इन्हें बड़े आंदोलन से जोड़ा।

  • चंपारण सत्याग्रह (1917): महात्मा गांधी ने भारत में अपना पहला सत्याग्रह बिहार के चंपारण में शुरू किया। यहाँ के किसान यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा जबरन नील की खेती करने के लिए मजबूर थे। इस आंदोलन ने किसानों की दुर्दशा को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और गांधी जी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
  • खेड़ा सत्याग्रह (1918): गुजरात के खेड़ा जिले में, फसल बर्बाद होने के बाद भी सरकार ने लगान माफ नहीं किया। गांधी जी और सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में किसानों ने लगान न देने का आंदोलन चलाया और अंततः सरकार को झुकना पड़ा।
  • बारदोली सत्याग्रह (1928): गुजरात के बारदोली में, सरकार ने भू-राजस्व में 30% की वृद्धि कर दी थी। सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में किसानों ने इस वृद्धि का जोरदार विरोध किया। यह आंदोलन सफल रहा और पटेल को “सरदार” की उपाधि मिली।
  • मोपला विद्रोह (1921): केरल के मालाबार में मोपला किसानों ने जमींदारों और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह किया। यह विद्रोह मुख्य रूप से आर्थिक शोषण के खिलाफ था, लेकिन इसे राष्ट्रीय आंदोलन से भी जोड़ा गया।

2. राष्ट्रीय आंदोलनों में भागीदारी

किसानों ने कांग्रेस द्वारा चलाए गए बड़े राष्ट्रीय आंदोलनों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

  • असहयोग आंदोलन (1920-1922): इस आंदोलन के दौरान, किसानों ने लगान देना बंद कर दिया और सरकारी कानूनों की अवहेलना की। उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में एक बड़ा किसान आंदोलन चला, जिसने असहयोग आंदोलन को मजबूती दी।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934): इस आंदोलन में भी किसानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देश के कई हिस्सों में “लगान-बंदी” (लगान न देने) के अभियान चलाए गए, जिसने सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं।
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): यह आंदोलन देश के कोने-कोने में फैल गया, और किसानों ने इसमें सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने सरकारी इमारतों पर हमले किए और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया।

3. किसान सभाओं और संगठनों का निर्माण

किसानों ने अपनी मांगों को संगठित रूप से उठाने के लिए कई किसान सभाएं और संगठन बनाए।

  • अखिल भारतीय किसान सभा (1936): स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में स्थापित इस संगठन ने किसानों को एक मंच पर लाने का काम किया। इसने जमींदारी प्रथा को समाप्त करने और किसानों को उनके अधिकार दिलाने की मांग उठाई।
  • किसान सभाएं: 1918 में उत्तर प्रदेश में किसान सभा का गठन हुआ, जिसने किसानों को एकजुट किया और उनकी शिकायतों को सामने लाया। जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता भी इन सभाओं से जुड़े रहे।

इस तरह, किसानों ने सीधे ब्रिटिश सरकार और उनके समर्थकों (जमींदारों) के खिलाफ संघर्ष करके स्वतंत्रता संग्राम को एक ठोस आधार प्रदान किया। उनके आंदोलन न केवल आर्थिक न्याय के लिए थे, बल्कि भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिलाने के बड़े लक्ष्य का भी हिस्सा थे।