लाल किला विस्फोट: सवालों के घेरे में सत्ता और सुरक्षा

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          हालिया खबर है कि एक शाम देश की राजधानी दिल्ली एक भयावह धमाके से दहल उठी। लाल किले के निकट एक चलती कार में हुए विस्फोट ने न केवल 10 लोगों की जान ले ली, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था और शासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, विस्फोट की तीव्रता इतनी अधिक थी कि आसपास खड़ी कई गाड़ियों में भी आग लग गई। घायलों की संख्या पचास से अधिक बताई जा रही है।दिल्ली पुलिस ने अब तक स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा है कि यह घटना आतंकी हमला थी या किसी अन्य आपराधिक साजिश का परिणाम। परंतु घटनास्थल की परिस्थितियाँ, बरामद सामग्री—अमोनियम नाइट्रेट आदि—और हालिया गिरफ्तारियाँ संकेत देती हैं कि यह एक संगठित आतंकी कार्रवाई हो सकती है।

          दिल्ली की शाम धमाके की गूंज में डूब गई। लाल किले के पास एक चलती कार में हुए बम विस्फोट ने दस लोगों की जान ले ली और पचास से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। धमाके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि आसपास खड़ी कई गाड़ियां भी जल उठीं। दिल्ली पुलिस ने इसे अब तक आतंकी हमला घोषित नहीं किया है, लेकिन घटनास्थल से मिले साक्ष्य — अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटक अवशेष — इस ओर इशारा करते हैं कि यह एक संगठित आतंकी साजिश भी हो सकती है।

अतीत के दावों और वर्तमान की हकीकत

          राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने एक बार कहा था कि “2014 के बाद देश में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। यह दावा शुरू से ही विवादास्पद रहा है। सच्चाई यह है कि 2014 से लेकर अब तक देश ने एक के बाद एक अनेक हमले झेले हैं।असम, गुरदासपुर, पठानकोट, उरी, नगरोटा, पालमपुर, कोकराझार, अमरनाथ यात्रा, पुलवामा, बेंगलुरु, पहलगाम —यह सूची लंबी है और भयावह भी। हर हमले ने देश की सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल उठाए, हर बार “कड़े कदम” और “शून्य सहनशीलता” की बातें हुईं, लेकिन हमले थमे नहीं। अब, जब राजधानी दिल्ली के दिल में — लाल किले के पास — धमाका हुआ है, तो यह सवाल और भी गूंजता है: क्या देश वास्तव में सुरक्षित है?

          सच तो ये है कि भाजपा के 11 साल के शासन के बावजूद, दिल्ली में कट्टा राज कैसे आया? दिल्ली में विस्फोट कैसे हुआ? और मैंने आपको बताया था कि यह सिर्फ़ दिल्ली का मामला नहीं है।

·        अगर पीछे मुड़कर देखें तो 2014 में उनकी सरकार बनने के बाद बेंगलुरु में बम धमाका हुआ। 2014 में असम में हिंसा हुई। 2015 में मादीपुर में हमला हुआ।

·        2015 में जम्मू में हमला हुआ था। गुरदासपुर में हमला हुआ था। 2016 में पामपुर में हमला हुआ था।

·        2016 में पठानकोट में हमला हुआ। कोकराझार में, बारामूला में, उरी में, हंदवाड़ा में। और फिर बारामूला में, नगरोटा के सैन्य अड्डे पर हमला हुआ।

·        2017 में अमरनाथ यात्रा पर हमला हुआ, सुकमा में हमला हुआ, भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में बम विस्फोट हुआ।

·        2018 में सुंजवान पर हमला हुआ। सुकमा पर हमला हुआ। 2019 में पुलवामा पर हमला हुआ।

·        2019 में जम्मू में एक बस स्टैंड पर ग्रेनेड फेंका गया। दंतेवाड़ा में हमला हुआ। कश्मीर में भी एक और हमला हुआ।

·         2020  में सुकमा में माओवादी हमला हुआ। सुकमा-बीजापुर हमला 2020 में हुआ। 2023 में राजौरी में हमला हुआ।

·        2023 में अलाथुर ट्रेन में आग लग गई। दंतेवाड़ा में बम विस्फोट हुआ। 2024 में बेंगलुरु के एक कैफे में बम विस्फोट हुआ।

·        2025 की शुरुआत में पहलगाम में एक हमला हुआ। और अभी 2025 भी नहीं बीता है कि दिल्ली में दूसरा हमला हो गया।

          यानी 2014 से 2025 तक नरेंद्र मोदी के शासन में हुए आतंकवादी हमलों की सूची रखी है। 2025 से 2025 तक नरेंद्र मोदी के शासन में हुए आतंकवादी हमलों की सूची रखी है। यह बहुत स्पष्ट है कि चाहे वह अजीत डोभाल हो, अमित शाह हो, नरेंद्र मोदी हो या आईटी सेल हो, उनके 11 साल के शासन में लगातार आतंकवादी हमले हुए हैं, जिन्हें रोकने में वह विफल रहे हैं।

 

केंद्र की जवाबदेही और दिल्ली की स्थिति:

          दिल्ली में शासन का हर महत्त्वपूर्ण तंत्र—पुलिस, प्रशासन और सुरक्षा—केंद्र सरकार के नियंत्रण में है। दिल्ली पुलिस सीधे गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है। ऐसे में यदि राजधानी में आतंकी विस्फोट होता है, तो जिम्मेदारी तय करना कठिन नहीं है। यह केवल दिल्ली की नहीं, भारत सरकार की विफलता है। गृह मंत्री अमित शाह बिहार चुनाव में व्यस्त थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वहीं प्रचार अभियान में थे। और घटना के तुरंत बाद प्रधानमंत्री जी भूटान रवाना हो गए—भूटान के राजा का जन्मदिन मनाने। सवाल यह नहीं कि भूटान क्यों गए, सवाल यह है कि क्या यह समय जाने का थादेश की राजधानी में विस्फोट, दस मौतें, पचास घायल, प्रदूषण से त्रस्त जनता—और प्रधानमंत्री विदेश में! राहुल गांधी के विदेश जाने पर तो मीडिया आसमान सिर पर उठा लेता है—लेकिन प्रधानमंत्री के विदेश दौरे पर सन्नाटा क्यों?

 

मीडिया की चुप्पी और दोहरे मानदंड:

          विपक्ष के किसी नेता, विशेषकर राहुल गांधी, के विदेश जाने पर मीडिया और भाजपा आईटी सेल शोर मचाते हैं — देश में संकट और वो विदेश में!पर जब प्रधानमंत्री मोदी, राजधानी में धमाका होने के अगले ही दिन विदेश चले जाते हैं, तो वही मीडिया मौन साध लेता है। क्या सवाल पूछने का अधिकार अब सिर्फ़ विपक्ष के खिलाफ इस्तेमाल होने लगा है?
क्या सत्ता से जवाब मांगना अब “राजनीति करना” कहलाता है?

खुफिया सूचना थी क्या?

          एक छात्र की सोशल मीडिया पोस्ट घटना से दो घंटे पहले आई थी। उसने लिखा था कि लाल किले के आसपास असामान्य पुलिस और सैन्य तैनाती देखी गई। अगर यह सही है, तो इसका मतलब है कि सुरक्षा एजेंसियों को पहले से किसी संभावित खतरे की जानकारी थी। फिर यह घटना रोकी क्यों नहीं गई? अगर जानकारी नहीं थी, तो सवाल और गंभीर है — खुफिया तंत्र आखिर कर क्या रहा थाफ़रीदाबाद और आस-पास के इलाकों में हाल ही में विस्फोटक सामग्री की बरामदगी हुई थी। संभव है कि किसी बड़े हमले की साजिश पहले से चल रही थी और असफल होने के डर से यह विस्फोट जल्दबाजी में कर दिया गया। लेकिन यह सिर्फ़ अनुमान है; असली जानकारी तो सरकार के पास ही है।

मीडिया की भूमिका और दोहरे मानदंड:

          जब विपक्ष का कोई नेता देश से बाहर जाता है, तो भाजपा आईटी सेल और गोदी मीडिया उसे “असंवेदनशील” और “अराजनीतिक” बताने में जुट जाती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी किसी आपदा या आतंकी घटना के बाद विदेश चले जाएँ, तो वही मीडिया मौन साध लेता है। क्या सवाल पूछना केवल विपक्ष के लिए आरक्षित है? क्या सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही की अपेक्षा करना अब देशद्रोह माना जाएगा?

घटना से जुड़े संकेत और सवाल:

          इस विस्फोट से कुछ घंटे पहले आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था असामान्य रूप से सख्त कर दी गई थी। एक छात्र ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उसने स्कूल से लौटते वक्त पुलिस और फ़ौज की भारी तैनाती देखी। अगर यह पोस्ट सही है, तो क्या खुफिया एजेंसियों के पास पहले से कोई सूचना थी? अगर थी, तो घटना को रोका क्यों नहीं गया? अगर नहीं थी, तो खुफिया तंत्र आखिर कर क्या रहा था? दिल्ली के पास के इलाकों—फ़रीदाबाद, गुड़गाँव—से पिछले कुछ दिनों में विस्फोटक सामग्री की बरामदगी हुई थी। यह संभव है कि कोई बड़ी जिश पहले से रची जा रही हो और उसके असफल होने के डर से जल्दबाजी में यह विस्फोट कर दिया गया हो। परंतु यह केवल एक अनुमान है—असली जानकारी तो भारत सरकार और उसकी एजेंसियों के पास ही है।

विकट परिस्थितियां और शासन की प्राथमिकताएँ:

          दिल्ली इस समय दोहरी मार झेल रही है—प्रदूषण और आतंक। हवा इतनी जहरीली हो चुकी है कि आँखों में जलन, साँस लेने में कठिनाई आम हो गई है। निर्माण कार्य जारी हैं, नियमों की अनदेखी हो रही है, और सरकार की संवेदनहीनता नागरिकों पर भारी पड़ रही है।ऐसे समय में प्रधानमंत्री का देश से बाहर जाना न केवल प्रतीकात्मक रूप से अनुचित लगता है, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी सवाल खड़ा करता है। क्या यह नेतृत्व का समय था या उत्सव का?

भूतकाल के सबक और वर्तमान की विफलता:

          जब 26/11 का मुंबई हमला हुआ था, तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी कांग्रेस सरकार को निशाने पर ले रहे थे। तब उनका तर्क था कि “सरकार कमजोर है, जवाबदेह नहीं है।” आज वही सवाल उनसे पूछा जा रहा है—क्या 11 वर्षों के आपके शासन में देश अधिक सुरक्षित हुआ है?  अगर नहीं, तो 56 इंच की छाती के दावे का अर्थ क्या रह गया? पुलवामा की जांच आज तक अधूरी है। देश अब तक नहीं जान सका कि इतना RDX कहाँ से आया, कैसे आया, और किसने लाया। अब दिल्ली विस्फोट से ठीक पहले बिहार चुनाव चल रहे हैं। क्या हर चुनाव के पहले ऐसी घटनाएँ महज संयोग हैं?

सवाल जरूरी हैंक्योंकि लोकतंत्र जिंदा रहना चाहिए:

          यह कोई राजनीतिक आरोप नहीं—यह लोकतंत्र की आत्मा है कि सत्ता से सवाल पूछे जाएँ। जो लोग देश की सुरक्षा का दावा करते हैं, उन्हें यह भी बताना होगा कि जब राजधानी की सड़कों पर बम फट रहे हैं, तब उनकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। हम यह भी मानते हैं कि जब तक गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस आधिकारिक जानकारी न दें, अफवाहें नहीं फैलनी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सवाल पूछे जाएंजवाब माँगे जाएँ और जवाब दिए जाएँ।

सवाल लोकतंत्र की सांस हैं:

          यह राजनीति नहीं, नागरिकता का दायित्व है कि सत्ता से सवाल पूछे जाएँ। जो सरकार देश की सुरक्षा का दावा करती है, उसे बताना होगा कि बार-बार ये चूक क्यों हो रही है। सवाल पूछना अपराध नहीं — यही लोकतंत्र की आत्मा है। और जब गोदी मीडिया मौन हो, तब नागरिक समाज को बोलना पड़ता है।

अंतिम शब्द:

          देश के नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। इस हमले में मारे गए सभी निर्दोष लोगों के प्रति गहरी संवेदनाएँ। घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना।सरकार से अपेक्षा है कि वह न केवल दोषियों को पकड़ने के ठोस कदम उठाए, बल्कि इस पूरे तंत्र की समीक्षा करे जो बार-बार चूक जाता है।और जनता से अनुरोध है कि अफवाहों से दूर रहें, सतर्क रहें और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देश की सुरक्षा में सहयोग करें।हम सवाल पूछते रहेंगे — क्योंकि यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। हम दिल्ली के साथ हैं, देश के साथ हैं, और सच्चाई के साथ हैं। हमले में मारे गए निर्दोष नागरिकों के प्रति गहरी संवेदनाएँ। घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना।सरकार से अपेक्षा है कि वह न केवल दोषियों को सख़्त सज़ा दे, बल्कि पूरे सुरक्षा ढांचे की समीक्षा करे — ताकि राजधानी में, और देश में, ऐसी भयावह घटना दोबारा न हों।

हम सवाल पूछते रहेंगे —क्योंकि सवाल ही नागरिकता की सबसे बड़ी ताकत हैं।  हम दिल्ली के साथ हैं। हम देश के साथ हैं। और सबसे बढ़कर — हम सच के साथ हैं।

          (यह लेख अशोक कुमार पांडे के वीडियो वक्तव्य पर आधारित है। इसमें घटनाओंसंदर्भों और तथ्यों को संपादकीय रूप में संयोजित किया गया है। https://youtu.be/ZInb7N7zkT4?si=QULtyNKb802zfJE3)

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