जंगल गाँव के पास,दर्द, डर और जान का खतरा – सब खत्म

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40 साल पहले रुद्रप्रयाग के कोटमल्ला गाँव में एक दर्दनाक घटना हुई, एक महिला घने जंगल से लकड़ी और चारा लाते हुए फिसलकर गिर गई और उसकी मौत हो गई। तभी BSF जवान जगत सिंह के मन में एक संकल्प जन्मा- “अगर जंगल गाँव के पास होगा, तो किसी महिला को चारा और लकड़ी के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। दर्द, डर और जान का खतरा – सब खत्म हो जाएगा।” यही सोच लेकर रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपनी 1.5 हेक्टेयर बंजर ज़मीन को जंगल में बदलने की कसम खाई।

40 साल पहले रुद्रप्रयाग के कोटमल्ला गाँव में एक दर्दनाक घटना हुई, एक महिला घने जंगल से लकड़ी और चारा लाते हुए फिसलकर गिर गई और उसकी मौत हो गई।

तभी BSF जवान जगत सिंह के मन में एक संकल्प जन्मा- “अगर जंगल गाँव के पास होगा, तो किसी महिला को चारा और लकड़ी के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। दर्द, डर और जान का खतरा — सब खत्म हो जाएगा।”

यही सोच लेकर रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपनी 1.5 हेक्टेयर बंजर ज़मीन को जंगल में बदलने की कसम खाई।

अकेले ही… बीज बोए, पौधे लगाए, पानी ढोया, गड्ढे खोदे और सालों तक पेड़ों की देखभाल की

आज उसी जगह पर उग रहे हैं, देवदार, बांज, चीड़, बुरांश, ओक, काफल और 70 से ज़्यादा प्रजातियों के लाखों पेड़।

लोग उन्हें प्यार से कहते हैं — जंगली दादा।

जगत सिंह ने सिर्फ जंगल ही नहीं उगाया, उन्होंने गाँव में लाया, जल संरक्षण, मधुमक्खी पालन, जैविक खेती, सौर ऊर्जा और शुरू की पर्यावरण शिक्षा की पाठशाला, जहाँ आज तक 50,000 से ज़्यादा विद्यार्थी सीख चुके हैं।

उनका बेटा अब इस मिशन को पूरे देश में आगे बढ़ा रहा है।