*आजादी से पहले कैसी थी भारत की कृषि व्यवस्था?अंग्रेजों ने कृषि को किया था तबाह* 

0
202

धरती फिर से सोना उगल रही है। लेकिन, ब्रिटिश हुकूमत में ऐसा नहीं था। अंग्रेजी सरकार के बजट में देश की कृषि के लिए कोई खास जगह नहीं थी। इसके उलट किसानों पर बेतहाशा कर लगाए जाते थे। 1922-23 में सिर्फ 1.9% भूमि पर बेहतर बीज बोए जाते थे। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी स्थिति खराब रही। 1939 में पूरे भारत में केवल छह कृषि महाविद्यालय थे, और कई राज्यों में एक भी नहीं।

इतिहासकारों के मुताबिक, लकड़ी के हल से किसान जिस धरती का सीना चीरकर फसल उगाता था, वो उसकी होकर भी उसकी नहीं थी। तकनीकी स्तर पर देश की खेती बिलकुल अंजान थी। मानसून और बारिश पर किसान निर्भर रहता था। आइए जानते हैं आजादी से पहले कैसी थी भारत की कृषि व्यवस्था? 

कर वसूली, नकदी फसलों की जबरन खेती
इतिहासकारों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों ने भारत की पारंपरिक और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। upscwithnikhil के मुताबिक, आजादी से पहले का भारत जहां खेती में विविधता, सामुदायिक सहयोग और स्थानीय संसाधनों पर आधारित था, वहीं ब्रिटिश शासन के दौरान यह व्यवस्था कर वसूली, नकदी फसलों की जबरन खेती और तकनीकी पिछड़ेपन की गिरफ्त में आ गई।

बिगड़ गए थे किसानों के हालत – फोटो : सोशल मीडियाजमींदारी प्रथा और भारी लगान
विशेषज्ञों के अनुसार, जमींदारी प्रथा और भारी लगान ने किसानों को उत्पादन सुधार के बजाय जीविका बचाने की जद्दोजहद में डाल दिया। 1905 तक जहां रेलवे पर 360 करोड़ रुपये खर्च किए गए, वहीं सिंचाई जैसी बुनियादी जरूरत पर सिर्फ 50 करोड़ रुपये से कम निवेश हुआ। इससे खेत वर्षा पर निर्भर रहे और बार-बार अकाल की मार झेलनी पड़ी।

1951 में देश में 3.18 करोड़ लकड़ी के हल
तकनीकी स्तर पर भी भारत पिछड़ा रहा। 1951 में देश में 3.18 करोड़ लकड़ी के हल थे, जबकि लोहे के हल केवल 9.3 लाख। उर्वरकों और उन्नत बीजों का प्रयोग बेहद सीमित था। 1922-23 में सिर्फ 1.9% भूमि पर बेहतर बीज बोए जाते थे। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी स्थिति खराब रही। 1939 में पूरे भारत में केवल छह कृषि महाविद्यालय थे, और कई राज्यों में एक भी नहीं। इसका असर यह हुआ कि 1901 से 1939 के बीच कृषि उत्पादन में 14% की गिरावट दर्ज की गई। 

बिगड़ गए थे किसानों के हालत
कृषि में अत्यधिक भीड़भाड़ और उप-सामंतवाद में वृद्धि के परिणामस्वरूप भूमि विभाजित होकर छोटी-छोटी जोतों में विखंडित हो गई, जिनमें से अधिकांश अपने किसानों का भरण-पोषण करने में असमर्थ थे। अत्यधिक गरीबी के कारण, अधिकांश किसान बेहतर मवेशियों और बीजों, अधिक खाद और उर्वरकों, और उन्नत उत्पादन तकनीकों का उपयोग करके कृषि में सुधार करने में असमर्थ थे। 

इतिहासकारों का कहना है कि ब्रिटिश नीतियों ने कृषि को आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था से नकदी फसल आधारित, कर-उन्मुख और तकनीकी रूप से पिछड़े क्षेत्र में बदल दिया। इसका असर आज़ादी के बाद भी लंबे समय तक दिखाई देता रहा।