फलीभेदक कीट से चने की फसल को कैसे बचाएं?

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चना  को दलहनी फसलों का राजा माना जाता है और भारत में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. चना भारत में दलहनी फसलों की कुल पैदावार का 40 परसेंट है, और इसके वैश्विक उत्पादन का लगभग 70 परसेंट हिस्सा भारत में होता है. हालांकि, चने की फसल उकठा रोग और फलीभेदक कीट से सबसे अधिक प्रभावित होती है. ये रोग और कीट चने की फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे किसानों के लिए आर्थिक संकट पैदा हो जाता है. विशेषकर फलीभेदक कीट का प्रकोप फरवरी और मार्च में ज्यादा होता है, और अगर इसे समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो यह पैदावार में 50-60 कमी तक कमी ला सकता है.

फलीभेदक कीट से चने की फसल को कैसे बचाएं?

फली भेदक कीट चने की फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है. यह कीट नवंबर से मार्च तक चने की फसल में सूंडी रूप में सक्रिय रहता है. शुरुआत में यह कीट पौधों की कोमल पत्तियों और टहनियों को खाता है, और जैसे-जैसे फली आती है, यह उसके अंदर प्रवेश कर बीजों को खा जाता है. इस कीट के कारण चने की पैदावार में भारी गिरावट हो सकती है, जिससे किसानों को बड़ा नुकसान होता है.

फेरोमोन ट्रैप से कीट की करें निगरानी

फेरोमोन ट्रैप चने के फलीभेदक कीट की संख्या की निगरानी करने का एक प्रभावी तरीका है. इस जाल में मादा फलीभेदक द्वारा छोड़े गए यौन स्राव रसायन का उपयोग किया जाता है, जो नर पतंगों को आकर्षित करता है. इस विधि से हम कीटों के प्रकोप का पूर्वानुमान कर सकते हैं और समय रहते फसल सुरक्षा उपायों को लागू करके फसल को बचा सकते हैं. फेरोमोन ट्रैप टीन या प्लास्टिक का बना होता है, जिसमें मोम की एक थैली लगी रहती है. इसे खेत में फसल से 2 फीट की ऊंचाई पर लगाया जाता है. जाल के अंदर मादा पतंग से निकलने वाले रसायन से नर पतंग आकर्षित होकर जाल में फंस जाते हैं. प्रति हेक्टेयर 4-5 जाल लगाए जाने चाहिए और जाल में फंसे नर पतंगों की नियमित निगरानी करनी चाहिए. जब लगातार 4-5 रातों तक 4-5 नर पतंगे जाल में दिखाई दें, तो तुरंत फसल सुरक्षा उपायों को लागू करें.

जानें जैविक तरीके से कीट की रोकथाम

चने के खेतों में 30-40 अड्डे प्रति हेक्टेयर की दर से लगाकर कीट-भक्षी पक्षियों को आकर्षित किया जा सकता है. ये पक्षी फलीभेदक की सूंडी का शिकार करते हैं. खेत के चारों ओर धनिया जैसी पराग वाली फसल लगाकर परजीवी कीड़ों को बढ़ावा दिया जा सकता है, जो फलीभेदक कीटों के प्राकृतिक शिकार होते हैं. नीम की निबौली एक प्रभावी जैविक उपाय है. 15 किलो निबौली को कूट कर 85 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें.

एनपीवी वायरस खत्म करेगा कीट

एनपीवी वायरस (Nuclear Polyhedrosis Virus) चने के फलीभेदक की सूंडी के नियंत्रण के लिए एक प्राकृतिक और पर्यावरण फ्रेंडली तरीका है. यह विषाणु सूंडी को संक्रमित करता है, जिससे सूंडी धीरे-धीरे मर जाती है. एनपीवी का प्रयोग चने की फसल पर किया जा सकता है, जो चने के फली भेदक के  नियंत्रण में सहायक है. इसमें सबसे पहले एनपीवी से संक्रमित सूंडियों को इकट्ठा करके एक घोल तैयार करें. इस घोल को पानी में मिलाकर छिड़काव करें. छिड़काव का उपयुक्त समय सुबह या शाम का होता है, ताकि सूर्य की तेज किरणों से एनपीवी का प्रभाव कम न हो.

आखिर में करें केमिकल दवाओं का इस्तेमाल

रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग तब करना चाहिए जब चना फलीभेदक का प्रकोप अत्यधिक हो और जैविक उपायों से नियंत्रण संभव न हो. कुछ प्रमुख कीटनाशक हैं जिनका इस्तेमाल कर सकते हैं. इण्डोक्साकार्ब 14.5% SC: 0.5 मि.ली./लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें या क्वीनालफोस 25% EC: 1.0-1.4 मि.ली./लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें या स्पाइनोसैड 45% SC: 0.2 मि.ली./लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. इमामेक्टीन बेन्जोएट 5% EC: 0.4 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

चने की खेती में इन बातों का ध्यान रखें 

मई-जून में खेतों की गहरी जुताई करने से फलीभेदक के कोष नष्ट हो जाते हैं, जो कीटों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद करता है. चने की बुवाई अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक करनी चाहिए ताकि फसल मध्य मार्च तक पककर तैयार हो जाए, जिससे फलीभेदक की सूंडी द्वारा फसल को कम नुकसान हो. चने की फसल में सरसों (4:2) या अलसी (2:1) के साथ अन्तः फसल लगाने से चने के फली भेदक के प्रकोप को कम किया जा सकता है.

चने की फसल के लिए फलीभेदक कीट के प्रभावी नियंत्रण के लिए उचित समय पर सही उपायों को अपनाना बेहद जरूरी है. किसान अगर सही प्रबंधन रणनीतियां अपनाते हैं, तो वे इन खतरनाक कीटों से अपनी फसल को बचा सकते हैं और अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं.