*प्रभात में अंधकार पलायन कर रहा होता है एवं गोधूलि बेला में प्रकाश*

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श्रीमती पूजा अग्निहोत्री दुबे -मेरी कलम से

)नना मानना और पहचानना तीनों में परिपक्वता केवल भगवान की कृपा से ही संभव होती है  प्रभात एवं गोधूलि बेला मैं प्रकाश एवं अंधकार का करतब लगभग समान होता है अंतर इतना है प्रभात में अंधकार पलायन कर रहा होता है एवं गोधूलि बेला में प्रकाश। जोकि एक बड़ा अंतर है। किंतु इस समय नभमंडल में हमारे समक्ष प्राकृतिक दृश्य लगभग एक जैसा उपस्थित होता है जो भ्रमित करता है की आने वाला कौन है प्रकाश अथवा अंधकार हमारा जीवन भी लगभग ऐसा ही है जो अंदरहै वह बाहर भी घटित हो रहा है इसमें भी दोनों स्थितियों लगभग एक जैसी हैं जो दृश्य तो एक जैसा उपस्थित करती हैं किंतु अत्यंत भ्रामक हैं। हमारे जीवन में जो भी घटित होता है इसके पूर्वअनुमान को ज्योतिष कहा जाता है ज्योतिष के द्वारा किसी घटनाक्रम को 

टाला नहीं जा सकता किंतु यह अवश्य ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है की आने वाला समय प्रकाश से युक्त है अथवा अंधकार से। यही इसका महत्व है। जो हमें बताता है कि अब दीपक लगाना है क्योंकि प्रकाश पलायन कर रहा है एवं अंधकार प्रविष्ट हो रहा है दूसरी स्थिति में यह हमें बताता है कि हमें किसी भी प्रकार की दीपक की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि आकाश में सूर्य उदित होने वाला है। सदैव ईश्वर की शरण में रहते हुए भ्रम से बचाव के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। सत में असत का भ्रम एवं असत्य में सत का भ्रम दोनों ही स्थितियां अत्यंत ही दुखदाई हैं। इस संदर्भ में हमारे शास्त्रों में विभिन्न प्रकार के उदाहरण उपस्थित हैं अतः जानना मानना और पहचानना तीनों शब्दों पर ध्यान आवश्यक है शायद अनिवार्य भी। अथवा फिर जापर कृपाराम की होई, तापर कृपा करें सब कोई। इतनी भगवान की कृपा हो इस स्थिति में न जानना आवश्यक है ना मानना और ना ही पहचाना क्योंकि सब कुछ स्वत ही स्पष्ट हो जाता है किसी प्रकार का कोई भ्रम आरूण नहीं होता सत्य रूपी प्रकाश के प्रकट होने के कारण सारे ग्रह नक्षत्र बार एवं राशियां स्वयं ही ही अनुकूल हो जाती है।

श्रीमती पूजा अग्निहोत्री दुबे मेरी कलम से।