इंदौर में सोयाबीन की उन्नत किस्मों, आधुनिक कृषि तकनीकों और उपकरणों पर चर्चा के लिए कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसमें केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान शामिल हुए। उन्होंने किसानों और वैज्ञानिकों के साथ में काम करने के फायदे बताए। मंत्री चौहान ने खुद ट्रैक्टर चलाकर खेती की नई तकनीक के अनुभव साझा किए।
लैब में बैठा वैज्ञानिक और खेत में पसीना बहाता किसान, ये दोनों अक्सर अलग-अलग रहते हैं। अगर ये एक साथ बैठें और विचार करें, तो खेती में कई गुना तेजी से प्रगति हो सकती है। ये बात गुरुवार को केंद्रीय कृषि
दरअसल, जिले में स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान में कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसमें केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान शामिल हुए। इस आयोजन में देशभर के कृषि वैज्ञानिकों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और गुजरात के किसानों ने भी भाग लिया।
कमरे में नहीं खेत में जाकर देखी प्रक्रिया
कार्यक्रम के दौरान चौहान ने उन्नत किस्मों की सोयाबीन खेती और नई तकनीकों का निरीक्षण किया। उन्होंने खुद खेत में जाकर आधुनिक मशीनों से बुआई की प्रक्रिया भी देखी। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक विधियों को किसानों तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। उन्होंने कहा कि कृषि वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर सर्वे कर रहे हैं। फसल रोगों का विश्लेषण कर इलाज सुझा रहे हैं और किसानों को प्रशिक्षित कर रहे हैं।
सोयाबीन एमएसपी की दी जानकारी
मंत्री ने जानकारी दी कि केंद्र सरकार ने सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5300 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। साथ ही उसकी खरीद की गारंटी भी दी जाएगी। इसके अलावा बिहार की लीची और उत्तर प्रदेश के गन्ना सहित करीब 30 फसलों पर वैज्ञानिक शोध और सुधार कार्य जारी हैं।
पाम ऑयल पर बोले कृषि मंत्री
मंत्री चौहान ने पाम ऑयल आयात पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि सरकार आयात-निर्यात नीतियों में किसान और उपभोक्ता दोनों का हित ध्यान में रखकर निर्णय लेती है। चौहान ने माना कि भारत में खाद्य तेलों की कमी को पूरा करने के लिए आयात जरूरी हो जाता है। लेकिन इंपोर्ट ड्यूटी लगाकर घरेलू किसानों को भी संरक्षण दिया जा रहा है।
खुद ट्रैक्टर चलाकर दिखाई नई तकनीक
चौहान ने यह भी कहा कि मध्यप्रदेश में खेतों के लिए मजदूर मिलना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में आधुनिक उपकरणों की जरूरत और उनकी उपलब्धता पर तेजी से काम हो रहा है। उन्होंने खुद ट्रैक्टर चलाकर नई बुआई तकनीक का अनुभव भी साझा किया और किसानों को प्रोत्साहित किया कि वे वैज्ञानिकों से संवाद करें और आधुनिक पद्धतियों को अपनाएं।




