खेतों में घटते आर्गेनिक कार्बन से बिगड़ रही मिट्टी की सेहत

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मिट्टी की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने में ऑर्गेनिक कार्बन एक आवश्यक तत्व है। लेकिन इंसानी गतिविधियों के बढ़ने और केमिकल युक्त खाद के इस्तेमाल से मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन के स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। जर्मनी के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि बढ़ती इंसानी गतिविधियों के चलते प्राकृतिक तौर पर मिट्टी में मौजूद कार्बन भंडार लगभग 24 फीसदी तक घट गया है। 

पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में मिट्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है। छोटे-छोटे जीवों और पेड़-पौधों के लिए मिट्टी जीवन का आधार है। वहीं मिट्टी की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने में ऑर्गेनिक कार्बन एक आवश्यक तत्व है। लेकिन इंसानी गतिविधियों के बढ़ने और केमिकल युक्त खाद के इस्तेमाल से मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन के स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। हाल ही में जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि बढ़ती इंसानी गतिविधियों के चलते प्राकृतिक तौर पर मिट्टी में मौजूद कार्बन भंडार लगभग 24 फीसदी तक घट गया है। यह कमी लगभग 344 अरब मीट्रिक टन ऑर्गेनिक कार्बन के बराबर है। यह एक ऐसा आंकड़ा है, जो पिछले पचास सालों में दुनिया भर में कोयला, तेल और गैस से हुए कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर है। साइंस जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारत में मिट्टी के अम्लीय होने से अगले 30 सालो में मिट्टी की ऊपरी 0.3 मीटर सतह से 3.3 बिलियन टन अकार्बनिक कार्बन का नुकसान हो सकता है। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में कहा है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए हमें मिट्टी में मौजूद कार्बन के भंडार को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर कदम उठाने की जरूरत है।

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने उपग्रह के डेटा, भूमि केइस्तेमाल के रिकॉर्ड और मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से वैश्विक स्तर पर कार्बन भंडार का अनुमान तैयार किया। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि जंगलों की कटाई, खाद्यान सुरक्षा के लिए खेती के विस्तार और बढ़ती चारागाहों की जरूरत के चलते मिट्टी के आर्गेनिक कार्बन को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। वहीं जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम में बदलाव और एक्स्ट्रीम इवेंट्स के मामले तेजी से बढ़े हैं। बाढ़, तेज बारिश और सूखे से भी जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत को नुकसान पहुंचा है।

मिट्टी की अच्छी सेहत मानव स्वास्थ्य और सस्टेनेबल डेवलपमेंट ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी है। भारत ने खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है, फिर भी भुखमरी, लोगों के बेहतर स्वास्थ्य और गरीबी को दूर करना अभी भी एक चुनौती है। आईआईटी खड़गपुर और देश के कई बड़े कृषि वैज्ञानिकों की ओर से किए गए एक अध्ययन जिसे साइंस डायरेक्ट ने प्रकाशित किया है, में पाया गया गया कि भारत में मिट्टी में औसत ऑर्गेनिक कार्बन (एसओसी) की मात्रा लगभग 0.54% है, इसलिए ज्यादातर इलाकों में मिट्टी में प्रमुख और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है। किसानों के खेतों में बड़े पैमाने पर मृदा परीक्षण से पता चलता है कि 70% से ज्यादा क्षेत्रों में मिट्टी या तो मृदा अम्लता या मृदा क्षारीयता से ग्रस्त हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 29 फीसदी मिट्टी के क्षरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है, और कई पादप पोषक तत्वों की कमी भारतीय जनसंख्या में कुपोषण को बढ़ा रही है। शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत में छोटे किसानों को नई कृषि तकनीक की आवश्यकता है। पिछले एक दशक में, स्मार्ट सेंसिंग, रोबोटिक्स, रिमोट सेंसिंग आदि को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिशन और तेज़ी से बदलते कृषि अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र जैसे महत्वाकांक्षी सरकारी कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।