अक्सर आपने पहाड़ों पर गेंदे जैसे दिखने वाले एक फूल को देखा होगा. इस फूल को जंगली गेंदा के तौर पर जानते हैं और अंग्रेजी में इसे टैजेटिस माइन्यूटा या साउथ कोन मैरीगोल्ड के नाम से भी जाना जाता है. आज यह पहाड़ों पर बसे लोगों के लिए इनकम का अच्छा जरिया बन गया है. जंगली गेंदा एक तरह का एसेंशियल ऑयल या फिर सुगंधित तेल को बनाने में काम आता है. न सिर्फ एसेंशियल ऑयल बल्कि इसका प्रयोग इत्र से लेकर कीटनाशक तक बनाने में काम आता है. इसी तेल की वजह से आज पहाड़ों में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर भी सुधर गया है. जानिए इसके बारे में सबकुछ.
कहां-कहां पर होती है इसकी खेती
ऐस्टेरेसी प्रजाति में आने वाला जंगली गेंदे का पौधा हल्की ठंड के मौसम का पौधा है. इसके पौधे से सुगंधित तेल बनाया जाता है और इस वजह से इसे पहाड़ों में अनमोल समझा जाता है. टैजेटिस माइन्यूटा का पौधा टहनी समेत करीब एक एक से दो मीटर तक लंबा होता है. यह गेंदे की वह प्रजाति है जिसमें सबसे ज्यादा ऑयल होता है और वह भी हाई क्वालिटी का. इससे बनने वाले तेल को टैजेटिस ऑयल के नाम से बाजार में बेचा जाता है. भारत के अलावा दक्षिण अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, नाइजीरिया, उरुग्वे, केन्या, ब्राजील, फ्रांस, चिली, बोलिविया और पैराग्वे के चाको में इसकी खेती की जाती है. वहीं दुनिया में फ्रांस, केन्या, अर्जेंटाइना और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश इसके तेल उत्पादन में सबसे आगे हैं.
हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर में खेती
भारत की अगर बात करें तो यह प्रजाति हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के 1000 से 2500 मीटर वाले पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली पौधे के तौर पर पाई जाती है. इन क्षेत्रों में मिलने वाला गेंदे का पौधा टैजेटिस ऑयल का प्रमुख स्त्रोत है. आमतौर पर गेंदे का पौधा ऐसे क्षेत्रों में होता है जहां पर मिट्टी हल्की और नरम हो और जहां पर इसमें फूल आते समय राते ठंडी हों. कृषि विशेषज्ञों की मानें तो इस पौधे के लिए 12 से 13 डिग्री सेंटीग्रेट तक का तापमान बेहतर रहता है. इसकी खेती से पहाड़ों के किसान दो लाख रुपये से भी ज्यादा की आय कमा रहे हैं.
पौधा लगाते समय रखें इन बातों का ध्यान
इस पौधे को लगाने के लिए सबसे पहले 10×1 मीटर तक की पट्टीदार क्यारिंयों को तैयार करें. इस तरह से क्यारियों में लगाने से खरपतवार,दूर रहते हैं, सिंचाई के अलावा और पौधों को उखाड़ने में आसानी रहती है. विशेषज्ञों के अनुसार इस पौधे की हर क्यारी में कम्पोस्ट खाद और 100 ग्राम एनपीके फर्टिलाइजर या फिर डीएपी 50 किलोग्राम गोबर खाद के साथ डालनी चाहिए.
पौधे के बीजों को 10 से 15 सेंमी. की दूरी पर बोना चाहिए और मिट्टी की हल्की सी परत से ढंक देना चाहिए. बीज बोने के बाद 10 से 15 दिनों के बाद इसमें अंकुर फूटने लगते हैं. बीज बोने के 40 से 60 दिनों के अंदर पौधा 10 से 13 सेंमी. तक बढ़ जाता है. अगर आप नर्सरी से इसका पौधा लेकर आएं तो फिर हर लाइन में लगाते समय दो पौधों के बीच कम से कम 30 सेंमी. तक का फासला जरूर रखें.
खरपतवार से कैसे रखें दूर
जंगली गेंदा शुरुआत के 60 दिनों में बहुत ही धीमी गति से बढ़ता है. चूंकि इस पौधे पर खरपतवार के हमले की आशंका बहुत होती है तो ऐसे में 2 से 3 बार तक पौधे की निराई-गुड़ाई जरूरी हो जाती है. बारिश के मौसम में हाथ से खरपतवार को निकालकर इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. पौधे के पत्ते और फूलों के हिस्से में सुगंधित तेल होता है. जबकि इसकी टहनी में तेल नहीं होता है. ऐसे में फसल को जमीन के ऊपर वाले हिस्सों से काटना चाहिए यानी जहां से पौधे की हरी पत्तियां शुरू हो रही हैं. पौधे को बारीकी से काटना चाहिए.
कितना खर्च और कितनी कमाई
जंगली गेंदे की मांग ब्यूटी कॉस्मैटिक्स और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में काफी मांग है. इसके तेल और बाकी तत्वों का प्रयोग कोला और बाकी एल्कोहल फ्री ड्रिंक्स को बनाने में किया जाता है. इसके अलावा डेयरी प्रॉडक्ट्स, कैंडी, बेकरी, जिलेटिंस, पुंडिंग और ऐसे पदार्थों में भी इसका प्रयोग होता है. इसकी खेती में कुल 80 हजार रुपुये का खर्च आता है. पौधे में तेल की मात्रा 0.3 फीसदी होती है. तेल की फसल एक हेक्टेयर में करीब 36 से 45 किलोग्राम तक होती है. इसका तेल सात हजार रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बेचा जाता है. इससे कुल आय प्रति हेक्टेयर करीब ढाई लाख रुपये की आमदनी होती है यानी नेट प्रॉफिट 1 लाख 72 हजार होता है.